पिछले दिनों पेट्रोल-डीजल कीमतों की बढ़ती मार आम जनता के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी कर रही थी। देश के अनेक शहरों में पेट्रोल 115 रुपये प्रति लीटर तक की सीमा तक पहुंच गया था, तो डीजल भी सैकड़ा लगाने तक पहुंच चुका था। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे तौर पर परिवहन सहित अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा था। लोगों के लिए घर चलाना तक मुश्किल हो रहा था। इसके बावजूद केंद्र सरकार पेट्रोल के दामों में कमी करने के लिए तैयार नहीं थी। केंद्र सरकार और उसके प्रवक्ता पेट्रोल कीमतों की बढ़ोतरी को विभिन्न तर्कों से सही ठहरा रहे थे। भाजपा नेताओं का तो यहां तक कहना था कि जनता पेट्रोल कीमतों की बढ़ोतरी पर कहीं भी धरना-प्रदर्शन नहीं कर रही है, क्योंकि वह केंद्र सरकार की इस नीतियों से सहमत है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार का खूफिया सूचना विभाग आईबी उसे इस बात की लगातार जानकारी दे रहा था कि पेट्रोल-डीजल कीमतों की बढ़ोतरी के कारण जनता में केंद्र और भाजपा के लिए नाराजगी बढ़ती जा रही है। इस नाराजगी का पांचों चुनावी राज्यों में भी गहरा असर पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य में जो चुनावी दृष्टि से केंद्र सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, वहां भी महंगाई सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर सामने आ सकती है। आईबी ने जुलाई अगस्त, सितंबर और अक्तूबर की अपनी चार रिपोर्ट्स में ईंधन की कीमतों के कारण पड़ रहे प्रभाव पर केंद्र को विस्तार से जानकारी दी थी।
माना जा रहा है कि इसके बाद ही सरकार हरकत में आई और उसने आनन-फानन में एक्साइज ड्यूटी घटाने का निर्णय लिया। भाजपा शासित राज्यों से भी अपने स्तर पर टैक्सों में छूट देकर जनता को राहत देने का काम किया गया। अब पेट्रोल रिजर्व को खोलकर सरकार इसी प्रकार का एक और संदेश दे रही है। अनुमान है कि पेट्रोल रिजर्व का उपयोग करने से पेट्रोल कीमतों में और कमी लाने में मदद मिलेगी। सरकार को अनुमान है कि इससे जनता को राहत मिलेगी और महंगाई के खिलाफ लोगों के आक्रोश में कमी आएगी।
आर्थिक मामलों के जानकार भाजपा के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने अमर उजाला से कहा कि बीते समय में पेट्रोल कीमतों के जरिए टैक्स इकट्ठा करना सरकार की मजबूरी थी। कोरोना काल में ज्यादातर उद्योग-धंधे बंद थे और इसके कारण सरकार के टैक्स कलेक्शन पर भी असर पड़ रहा था। एक तरफ टैक्स में कमी आ रही थी तो दूसरी तरफ सरकार को कोरोना काल में जनता को राहत देने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च करना पड़ रहा था। लोगों तक राशन पहुंचाने, आर्थिक सहायता देने, दवाइयां-स्वास्थ्य उपकरण पहुंचाने, वैक्सीन लगाने और अन्य मदों में भारी धन खर्च करना पड़ रहा था।
इस स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका और अन्य देशों की सरकारों ने सीधे टैक्स में राहत दी और लोगों तक सीधी नकद सहायता पहंचाई। कई देशों ने ज्यादा करेंसी की छपाई कर अपनी घाटे की स्थिति को संभालने का प्रयास किया। लेकिन अब इन्हीं देशों की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में हैं। ज्यादा करेंसी की छपाई से उलटा असर हुआ और अब यहां महंगाई दर बेलगाम होती जा रही है। अमेरिका में महंगाई तीन दशक से ज्यादा ऊपर छह फीसदी से अधिक हो गई है। यानी अर्थव्यवस्था को संभालने के ये प्रयास गलत साबित हुए।
अब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी लाने को भी भाजपा नेता ने सही ठहराया। उन्होंने कहा कि अब जब देश की अर्थव्यवस्था दबाव से निकल चुकी है, 90 फीसदी से ज्यादा उद्योग अपनी क्षमता से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, निर्यात क्षेत्र अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, केंद्र सरकार के पास आय के साधन बढ़ गए हैं। जीएसटी कलेक्शन हर महीने एक लाख करोड़ रुपये की मानसिक सीमा को पार कर रहा है, जो देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का संकेत दे रहा है। अब जबकि केंद्र के पास आय के विभिन्न स्रोत खुल चुके हैं, सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी कर जनता को राहत दे रही है।