जाति आधारित जनगणना को लेकर बिहार की राजनीति गरमाई हुई है। जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव समेत बिहार के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इन नेताओं की मांग है कि देश में जातिगत आधार पर जनगणना होनी चाहिए, जिससे पिछड़ी जातियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा सकें। बहरहाल बिहार के नेताओं को अब प्रधानमंत्री के जवाब का इंतजार है। लेकिन अभी तक भाजपा की चुप्पी का मतलब यही लगाया जा रहा है कि पार्टी अभी तक इस बात का आकलन ही नहीं कर पाई है कि जाति आधारित जनगणना से उसे नुकसान होगा या नहीं और यदि होगा तो कितना होगा?
भाजपा को डर क्षेत्रीय दलों के पाले में खिसक जाएगा वोट शेयर
विशेषज्ञ मानते हैं कि भाजपा को डर इस बात का है कि यदि जाति आधारित जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ गई तो उसका वोट बैंक खिसक कर क्षेत्रीय दलों के पाले में जा सकता है। गौरतलब है कि 2014 से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा का ओबीसी वोट शेयर लगातार बढ़ा है। ऐसा ओबीसी के मतदाताओं के बीच उसकी महत्वपूर्ण पैठ के कारण संभव हुआ। ऐसा नहीं है कि भाजपा को अन्य जाति समुदायों से समर्थन नहीं मिला। इसने अपने पारंपरिक समर्थकों जैसे उच्च जातियों और उच्च वर्गों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के अलावा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का भी वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की है।