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जाति आधारित जनगणना: 2014 से भाजपा का ओबीसी वोट शेयर बढ़ा, जनगणना के नतीजों से वोट बैंक खिसकने का डर

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Mon, 23 Aug 2021 04:02 PM IST

सार

जाति आधारित जनगणना को लेकर बेशक बिहार के नेताओं को अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जवाब का इंतजार है। लेकिन यह साफ दिखता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार जाति-आधारित जनगणना के लिए उत्सुक नहीं है। भाजपा के लिए ओबीसी का समर्थन बढ़ रहा है,  फिर उसके ना-नुकर का क्या मतलब है?
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ओबीसी वोट शेयर - फोटो : Amar Ujala

जाति आधारित जनगणना को लेकर बिहार की राजनीति गरमाई हुई है। जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव समेत बिहार के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इन नेताओं की मांग है कि देश में जातिगत आधार पर जनगणना होनी चाहिए, जिससे पिछड़ी जातियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा सकें। बहरहाल बिहार के नेताओं को अब प्रधानमंत्री के जवाब का इंतजार है। लेकिन अभी तक भाजपा की चुप्पी का मतलब यही लगाया जा रहा है कि पार्टी अभी तक इस बात का आकलन ही नहीं कर पाई है कि जाति आधारित जनगणना से उसे नुकसान होगा या नहीं और यदि होगा तो कितना होगा?

भाजपा को डर क्षेत्रीय दलों के पाले में खिसक जाएगा वोट शेयर
विशेषज्ञ मानते हैं कि भाजपा को डर इस बात का है कि यदि जाति आधारित जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ गई तो उसका वोट बैंक खिसक कर क्षेत्रीय दलों के पाले में जा सकता है। गौरतलब है कि 2014 से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा का ओबीसी वोट शेयर लगातार बढ़ा है। ऐसा ओबीसी के मतदाताओं के बीच उसकी महत्वपूर्ण पैठ के कारण संभव हुआ। ऐसा नहीं है कि भाजपा को अन्य जाति समुदायों से समर्थन नहीं मिला। इसने अपने पारंपरिक समर्थकों जैसे  उच्च जातियों और उच्च वर्गों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के अलावा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का भी वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की है। 



सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस)  के निदेशक संजय कुमार ने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में बताया कि भाजपा की दुविधा यही है ओबीसी ने 2014 और 2019 के चुनाव में उसे  बढ़चढ़ कर वोट किया था, जो उसका मुख्य वोट बैंक रहा है। वहीं ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों का जनाधार भी ओबीसी  ही है। ऐसे में यदि जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ गई तो भाजपा इस बात के लिए आश्वस्त नहीं दिख रही कि इसके बाद ओबीसी उसे कितना वोट करेगी, इसलिए पार्टी इस मामले पर अभी तक चुप है। 

संजय कुमार कहते हैं कि भाजपा अभी तक यह दिखाने की कोशिश करती रही कि वह जाति आधारित राजनीति नहीं करती है, जो कि वह करती है, लेकिन ओबीसी जैसे जातिगत मुद्दे को उसने हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के रंग में रंग दिया था। जातिगत राजनीति भाजपा भी कर रही है, पर उस कवर चढ़ा कर रखा हुआ है और भाजपा को इस कवर के फट जाने का डर है। इसलिए पहले यह भी समझना होगा कि भाजपा ने कैसे ओबीसी में अपनी पैठ बनाई। 

ओबीसी आरक्षण ने उत्तर भारत की राजनीति बदल दी
1990 के दशक की शुरुआत में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया। इससे  केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाने लगा। इससे भारतीय राजनीति का चेहरा बदल गया खासकर उत्तर भारत के राज्यों का। मंडल के बाद की राजनीति के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों का बिहार और उत्तर प्रदेश में उदय हुआ।

इन क्षेत्रीय दलों की ‘मंडल की राजनीति’ से भाजपा को ‘हिंदुत्व की राजनीति’ करने में बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा। इन क्षेत्रीय पार्टियों को ओबीसी ने बढ़चढ़ कर वोट किया। लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति नहीं रही। ओबीसी वोटरों पर क्षेत्रीय पार्टियों की पकड़ धीमी हुई और भाजपा को उसका फायदा मिला

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ओबीसी वोट शेयर - फोटो : Amar Ujala
जाति आधारित जनगणना को लेकर बिहार की राजनीति गरमाई हुई है। जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव समेत बिहार के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इन नेताओं की मांग है कि देश में जातिगत आधार पर जनगणना होनी चाहिए, जिससे पिछड़ी जातियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा सकें। बहरहाल बिहार के नेताओं को अब प्रधानमंत्री के जवाब का इंतजार है। लेकिन अभी तक भाजपा की चुप्पी का मतलब यही लगाया जा रहा है कि पार्टी अभी तक इस बात का आकलन ही नहीं कर पाई है कि जाति आधारित जनगणना से उसे नुकसान होगा या नहीं और यदि होगा तो कितना होगा?

भाजपा को डर क्षेत्रीय दलों के पाले में खिसक जाएगा वोट शेयर
विशेषज्ञ मानते हैं कि भाजपा को डर इस बात का है कि यदि जाति आधारित जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ गई तो उसका वोट बैंक खिसक कर क्षेत्रीय दलों के पाले में जा सकता है। गौरतलब है कि 2014 से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा का ओबीसी वोट शेयर लगातार बढ़ा है। ऐसा ओबीसी के मतदाताओं के बीच उसकी महत्वपूर्ण पैठ के कारण संभव हुआ। ऐसा नहीं है कि भाजपा को अन्य जाति समुदायों से समर्थन नहीं मिला। इसने अपने पारंपरिक समर्थकों जैसे  उच्च जातियों और उच्च वर्गों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के अलावा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का भी वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की है। 

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस)  के निदेशक संजय कुमार ने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में बताया कि भाजपा की दुविधा यही है ओबीसी ने 2014 और 2019 के चुनाव में उसे  बढ़चढ़ कर वोट किया था, जो उसका मुख्य वोट बैंक रहा है। वहीं ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों का जनाधार भी ओबीसी  ही है। ऐसे में यदि जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ गई तो भाजपा इस बात के लिए आश्वस्त नहीं दिख रही कि इसके बाद ओबीसी उसे कितना वोट करेगी, इसलिए पार्टी इस मामले पर अभी तक चुप है। 

संजय कुमार कहते हैं कि भाजपा अभी तक यह दिखाने की कोशिश करती रही कि वह जाति आधारित राजनीति नहीं करती है, जो कि वह करती है, लेकिन ओबीसी जैसे जातिगत मुद्दे को उसने हिंदुत्व या राष्ट्रवाद के रंग में रंग दिया था। जातिगत राजनीति भाजपा भी कर रही है, पर उस कवर चढ़ा कर रखा हुआ है और भाजपा को इस कवर के फट जाने का डर है। इसलिए पहले यह भी समझना होगा कि भाजपा ने कैसे ओबीसी में अपनी पैठ बनाई। 

ओबीसी आरक्षण ने उत्तर भारत की राजनीति बदल दी
1990 के दशक की शुरुआत में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया। इससे  केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाने लगा। इससे भारतीय राजनीति का चेहरा बदल गया खासकर उत्तर भारत के राज्यों का। मंडल के बाद की राजनीति के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों का बिहार और उत्तर प्रदेश में उदय हुआ।

इन क्षेत्रीय दलों की ‘मंडल की राजनीति’ से भाजपा को ‘हिंदुत्व की राजनीति’ करने में बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा। इन क्षेत्रीय पार्टियों को ओबीसी ने बढ़चढ़ कर वोट किया। लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति नहीं रही। ओबीसी वोटरों पर क्षेत्रीय पार्टियों की पकड़ धीमी हुई और भाजपा को उसका फायदा मिला

ओबीसी वोट शेयर - फोटो : Amar Ujala
पिछले लोकसभा चुनाव से भाजपा ने ओबीसी के बीच पैठ बनाई
2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर पैठ बनाई,  जिससे क्षेत्रीय दलों के वोट शेयर में सेंध लग गई। उनका वोट शेयर घटकर 26.4 फीसदी रह गया। लोकनीति-सीएसडी के किए गए सर्वेक्षणों के मुताबिक भाजपा ने पिछले एक दशक के दौरान ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर अपनी पकड़ बना ली है।

2009 के लोकसभा चुनावों में महज  22 फीसदी ओबीसी ने भाजपा को वोट किया था और 42 प्रतिशत ने क्षेत्रीय दलों को चुना। लेकिन एक दशक के भीतर, ओबीसी के बीच भाजपा का जनाधार नाटकीय रूप से बदल गया है। 2014 में भाजपा को जहां 34 फीसदी ओबीसी वोट मिले वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान,  44 फीसदी ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया। वहीं इस साल क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर खिसकर 27 फीसदी रह गया।

आरक्षण बढ़ाने की मांग होगी  
अभी जनसंख्या के आधार पर अनसूचित जातियों को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजातियों को साढ़े सात फीसदी आरक्षण मिलता है। मंडल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक अभी देश में 52 फीसदी ओबीसी आबादी होने का अनुमान है। इसी आधार पर अभी ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है। जाति आधारित जनगणना कराने से भाजपा के नाक-नुकर की एक बड़ी वजह यही मानी जा रही है।

कहा जा रहा है जाति आधारित जनगणना के बाद ओबीसी जातियों की संख्या बढ़ सकती है। जिसके बाद क्षेत्रीय दल ओबीसी को और आरक्षण देने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बना कर एक नया मुद्दा उछाल सकते हैं।  क्षेत्रीय पर्टियां सरकार से केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में कोटा बढ़ाने की मांग कर सकती है। इससे कई क्षेत्रीय दलों को नया राजनीतिक जीवन मिलेगा। जिससे भाजपा को एक बार फिर क्षेत्रीय दलों से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।  
 
संजय कुमार कहते हैं कि यह अलग बात है कि ओबीसी के आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना कितना व्यवहारिक होगा, सरकार इसे किस तरह लागू करेगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी आरक्षण की एक सीमा तय कर रखी है, लेकिन जैसे ही यह साफ होगा कि ओबीसी की संख्या बढ़ रही है, ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग निश्चित तौर पर उठेगी। 

बिहार को लेकर भाजपा में ज्यादा डर
इस मुददे पर बिहार के दो बडे दल जद(यू) और राजद साथ आ गए हैं। ये दोनों ओबीसी पर अपनी पकड़ बनाना चाहते हैं। दोनों दलों को लगता है कि जनगणना के बाद ओबीसी की जनसंख्या बढ़ सकती हैं और जिसका सियासी फायदा उठाया जा सकता है। दरअसल बिहार की पूरी राजनीति ओबीसी के इर्दे-गिर्द ही होती रही है। बिहार में ओबीसी बिहार में ओबीसी की करीब 33 जातियां आती हैं। इनमें यादव, कुर्मी, कुशवाहा (कोईरी), बनिया और सुनार शामिल हैं। 2020 के आसपास के नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के एक अनुमान के मुताबिक बिहार की करीब-करीब आधी जनसंख्या ओबीसी की है। 

बिहार में पहले दो पार्टियों का जनाधार एक खास जाति के बीच में था। यादव के लिए राजद और कुर्मी के लिए जद(यू) पसंदीदा पार्टी है। कोईरी वोट शेयर का फायदा उपेंद्र कुमार कुशवाहा को मिल रहा है। मुकेश साहनी भी अपनी ताकत बढ़ाने में लगे हैं। इन सभी पार्टियों का जनाधार ओबीसी की जातियों के इर्द-गिर्द ही है। इसलिए बिहार भाजपा को इस बात का भय लगने लगा है कि सारा ओबीसी जनाधार यदि इन पार्टियों की ओर चला गया तो बिहार में भाजपा फिर पुरानी स्थिति में जा सकती है और ओबीसी पार्टियों का आकर्षण क्षेत्रीय पार्टियों की तरफ बढ़ सकता है। भाजपा को सबसे ज्यादा डर बिहार की सियासी तस्वीर बदलने को लेकर ही लग रहा है जिसे हासिल करने के लिए पार्टी ने बहुत मेहनत की है। 
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