चिप या सेमीकंडक्टर की कमी ने अक्तूबर में कारों की डिलीवरी को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस वजह से कारों की बिक्री करीब 21 फीसदी घट गई है। कई महीनों से चल रहे वेटिंग पीरियड, उत्पादन में कटौती और छूट के लगभग नदारद होने की वजह से इस बार त्योहारी सीजन ऑटो सेक्टर के लिए बहुत फीका रहा है।
चिप की कमी की वजह से गाड़ियों के उत्पादन पर गहरा असर पड़ रहा है, जिससे ऑटो कंपनियां डीलरों को वाहनों की सप्लाई सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चिप की वैश्विक कमी की वजह से मारुति सुजुकी इंडिया, ह्यूंदै मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे वाहन बनाने वाली बड़ी कंपनियां अक्तूबर के महीने में यात्री वाहनों की थोक डिलीवरी नहीं कर पाई और समय पर डीलरों को गाड़ियां नहीं मिलीं। नवरात्र से ही गाड़ियों की खरीद की भारी मांग होती है लेकिन चिप की कमी के कारण डीलरों को कई बुकिंग रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
कहा जा रहा है कि यह कमी लंबे समय तक जारी रहने वाली है। चिप की आपूर्ति की बाधाओं के कारण दिवाली पर गाड़ियों की बिक्री कम होने का अनुमान है। इससे डीलरों को भारी नुकसान होने का अंदेशा है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब देश में कार उद्योगों के पास 350,000 से अधिक गाड़ियों के ऑर्डर पेंडिंग हैं।
Maruti Suzuki Swift Facelift 2021 Vs Old Swift
- फोटो : Amar Ujala Graphics
चिप या सेमीकंडक्टर की कमी ने अक्तूबर में कारों की डिलीवरी को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस वजह से कारों की बिक्री करीब 21 फीसदी घट गई है। कई महीनों से चल रहे वेटिंग पीरियड, उत्पादन में कटौती और छूट के लगभग नदारद होने की वजह से इस बार त्योहारी सीजन ऑटो सेक्टर के लिए बहुत फीका रहा है।
चिप की कमी की वजह से गाड़ियों के उत्पादन पर गहरा असर पड़ रहा है, जिससे ऑटो कंपनियां डीलरों को वाहनों की सप्लाई सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चिप की वैश्विक कमी की वजह से मारुति सुजुकी इंडिया, ह्यूंदै मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे वाहन बनाने वाली बड़ी कंपनियां अक्तूबर के महीने में यात्री वाहनों की थोक डिलीवरी नहीं कर पाई और समय पर डीलरों को गाड़ियां नहीं मिलीं। नवरात्र से ही गाड़ियों की खरीद की भारी मांग होती है लेकिन चिप की कमी के कारण डीलरों को कई बुकिंग रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
कहा जा रहा है कि यह कमी लंबे समय तक जारी रहने वाली है। चिप की आपूर्ति की बाधाओं के कारण दिवाली पर गाड़ियों की बिक्री कम होने का अनुमान है। इससे डीलरों को भारी नुकसान होने का अंदेशा है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब देश में कार उद्योगों के पास 350,000 से अधिक गाड़ियों के ऑर्डर पेंडिंग हैं।
ह्यूंदै एक्सेंट प्राइम सीएनजी दो वैरिएंट T और T+ में आती है।
उत्पादन में कटौती
यात्री वाहनों के कम डिलीवरी होने की वजह यह भी है कि चिप की कमी के कारण गाड़ी निर्माता कंपनियों ने उत्पादन में कटौती कर दी है। यह कटौती अगस्त में ही शुरू हो गई थी। मारुति ने कहा है कि उत्पादन में कटौती नवंबर में भी जारी रह सकती है।
ह्यूंदै ने सोमवार को कहा कि चिप की वैश्विक आपूर्ति में बाधा एक बडी चुनौती बनी हुई है जिसके परिणामस्वरूप पूरे उद्योग में उत्पादन कम हो रहा है। वहीं एमजी मोटर का कहना है कि वैश्विक रूप से चिप की किल्लत से उत्पादन में कमी आई जिसके परिणामस्वरूप बिक्री कम हुई है। वहीं समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करने की चुनौती नवंबर और दिसंबर तक बनी रहने की संभावना है और उम्मीद करते हैं कि अगले साल की पहली तिमाही में ही स्थिति बेहतर हो पाएगी।
सितंबर के दौरान, मारुति ने घरेलू बाजार में यात्री वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की। अक्टूबर में मारूति की पैसेंजेर गाड़ियों की थोक बिक्री में 33 प्रतिशत की गिरावट आई क्योंकि चिप खत्म हो गए थे। इसी तरह ह्यूंदै की अक्टूबर की बिक्री में 34 प्रतिशत की गिरावट आई है। ह्यूंदै मोटर इंडिया चिप की कमी से काफी समय तक प्रभावित नहीं हुआ था लेकिन अक्टूबर के आंकड़े बताते हैं कि आखिरकार उसके उत्पादन में भी गिरावट आई है। इसी तरह महिंद्रा एंड महिंद्रा की कुल बिक्री में 8.5 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है।
सेमीकंडक्टर चिप
- फोटो : pixabay
हालांकि, माल ढुलाई की उपलब्धता में सुधार की वजह से वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में सुधार हुआ है। टाटा मोटर्स और अशोक लीलैंड दोनों ने इस महीने के दौरान अच्छी संख्या में गाडियों की बिक्री की है। वाणिज्यिक वाहन निर्माता अशोक लीलैंड ने पिछले साल के इसी महीने की तुलना में अक्टूबर में 13 फीसदी अधिक वाहन बेचा है।
क्या टू-व्हीलर उद्योग भी प्रभावित है?
चिप की कमी ने टू-व्हीलर उद्योग को उतना प्रभावित नहीं किया है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक आइटम ज्यादातर उनके हाई-एंड मॉडल में उपयोग किए जाते हैं। लेकिन उनकी घरेलू मांग में कमी जारी है क्योंकि कोरोना की दूसरी लहर के कारण ग्रामीण इलाकों में टू-व्हीलर की मांग में कमी जरूर आई है।
वैश्विक चिप की कमी का कारण क्या है?
चिप की कमी का मुख्य कारण कोरोना महामारी और इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग में इजाफा को बताया जा रहा है। उपभोक्ताओं ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ और बच्चों की ‘ऑनलाइन क्लासेस’ की वजह से लैपटॉप और सर्वर खरीदना शुरू कर दिया। इसलिए जहां 2018 और 2019 के बीच दुनिया भर में सेमीकंडक्टर की बिक्री में गिरावट आई थी वहीं 2020 में बिक्री में 6.5 फीसदी की वृद्धि हुई। यह तेजी 2021 में जारी रहा है।
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एसोसिएशन के अनुसार, मई 2021 की बिक्री पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 26 फीसदी अधिक थी। लिहाजा कई कंपनियां चिप की कमी के कारण आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए दबाव झेल रही हैं। लेकिन इस संकट ने दो चिप निर्माण कंपनियों के दबदबे को भी साबित कर दिया। अभी मुख्य तौर पर चिप का निर्माम ताइवान की टीएसएमसी और दक्षिण कोरिया की सैमसंग कंपनी कर रही है।
ताइवान
- फोटो : Social media
ताइवान में सूखा भी एक कारण
महामारी के अलावा, इस कमी के लिए ताइवान में सूखे को भी एक बडी वजह माना जा रहा है। ताइवान में पिछले 50 सालों का सबसे खराब सूखा पड़ा है, जिसकी वजह से टीएसएमसी और अन्य निर्माताओं को पर्याप्त मात्रा में पानी के लिए संघर्ष करना पड़ा, जो चिप निर्माण में महत्वपूर्ण है। आईडीसी के सेमीकंडक्टर विश्लेषक शेन राउ ने मीडिया को दिए एक बयान में कहा, "कारखानों में आग, बिजली की कमी और स्वेज नहर में परिवहन रुकावट जैसे कारक भी चिप निर्माण में एक बाधा बन गए।"
कौन से क्षेत्र प्रभावित हैं?
चिप की कमी के सिर्फ ऑटो उद्योग ही नहीं बल्कि कई उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। इस वजह से सोनी के नए PS5 गेम कंसोल के शिपमेंट में देरी हुई। साथ ही टीवी और अन्य ओएलइडी डिस्प्ले की आपूर्ति को रोक दिया है। ऑटो उद्योग को खास तौर पर झटका लगा है। दुनिया भर में उत्पादक कंपनियों को चिप की कमी के कारण संघर्ष करना पड़ा। फोर्ड और जनरल मोटर्स दोनों ने उत्तरी अमेरिका में अपने यूनिट को लंबे समय तक बंद रखने की घोषणा की थी। जगुआर लैंड रोवर ने 2021 में जितनी बिक्री की उम्मीद की थी उसे आधा कर दिया।
e-Alfa Mini की लॉन्चिंग के दौरान महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के एमडी डॉ. पवन गोयनका (फाइल फोटो)
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ऑटो इंडस्ट्री को क्यों लगा है इतना झटका
चिप की किल्लत की वजह से ऑटो उद्योग को बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। जब महामारी की शुरुआत में वाहनों की मांग में कमी होने लगी तो गाड़ी निर्माता कंपनियों ने अपने ऑर्डर वापस ले लिए। लेकिन जब उन्होंने उत्पादन फिर से करना शुरू किया तो चिप पाने के लिए उन्हें कतार में लगना पड़ा। विशेषज्ञों का कहना है कि चिप का बिजनेस प्रॉफिट मार्जिन और वॉल्यूम पर आधारित है। ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स उनके व्यवसाय का एक बहुत छोटा हिस्सा है, इसलिए अब जब मांग बढ़ी है और ऑटो इंडस्ट्री को चिप की आवश्यकता है तो उन्हें प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
चिप की कमी दूर करने के उपाय क्या?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेमीकंडक्टर की मांग में वृद्धि जारी रहने की संभावना है क्योंकि ज्यादतर उद्योग डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन से गुजर रही है। चिप निर्माता कंपनी और सरकारें आपूर्ति श्रृंखला क्षमता को बढ़ाने के लिए काम कर रही है। टीएसएमसी अतिरिक्त क्षमता बढाने के लिए अगले तीन सालों में 100 मिलियन डॉलर का निवेश कर रही है। जबकि सैमसंग और एसके हाइनिक्स ने दक्षिण कोरियाई सरकार के साथ मिलकर चिप निर्माताओं के लिए क्षमता और प्रोत्साहन के लिए 451 बिलियन डॉलर का निवेश करने का वादा किया है।
दक्षिण कोरिया का सियोल शहर (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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विशेषज्ञ मानते हैं कि चिप की आपूर्ति श्रृंखला को सामान्य बनाए रखने के लिए ताइवान और दक्षिण कोरिया पर निर्भरता को कम करने की जरूरत है। ग्लोबलडाटा के सेमीकंडक्टर बाजार को कवर करने वाले माइक ओरमे ने अपने बयान में कहा, "अमेरिका कुल चिप का केवल 10 फीसदी उत्पादन करता है।" अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चिप के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए अपनी बिल्ड बैक बेटर योजना के तहत सेमीकंडक्टर क्षेत्र को बढ़ावा देनी की बात कही है।
कुछ महीने पहले संसद में पेश किए गए टेक फंडिंग बिल में यूएस चिप उत्पादन के लिए 52 बिलियन डॉलर खर्च करने का प्रस्ताव किया गया है। दूसरी तरफ इंटेल, अपनी क्षमता का विस्तार करने की योजना बना रहा है और एरिजोना में दो नए कारखानों पर 20 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है।
कमी कब दूर होगी?
पहले 2021 के अंत तक सेमीकंडक्टर की आपूर्ति में सुधार की उम्मीद की गई थी। लेकिन अब विशेषज्ञों का डर है कि वैश्विक चिप की कमी अब अगले साल तक चलने वाली है और 2023 तक बनी रह सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उद्योग विश्लेषक फर्म फ्यूचर होराइजन्स के सीईओ मैल्कम पेन ने जून में अपने एक बयान में कहा था क्षमता बढ़ाने के लिए जो मौजूदा निवेश किए जा रह हैं उसका असर होने में एक साल लग सकता है।