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उठी मांग: सैन्य अफसरों की तर्ज पर क्या ‘सीएपीएफ’ कैडर अफसरों को मिलेंगे केंद्रीय गृह मंत्रालय में सचिव स्तर के पद?

Fri, 14 May 2021 04:15 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद बताते हैं, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में नए बदलावों को लेकर हमेशा संशय के बादल छाए रहते हैं। कैडर अधिकारियों की क्षमता को कमतर आंका जाता है। यह अलग बात है कि इन अफसरों के पास 35 साल का फील्ड में काम करने का अनुभव होता है...
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गृह मंत्रालय - फोटो : ANI (File)
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विस्तार
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भारतीय सेना के चार अधिकारियों को पिछले दिनों 'सैन्य मामलों के विभाग' में अतिरिक्त सचिव और संयुक्त सचिव के पद पर तैनात किया गया है। इसके बाद केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' के कैडर अधिकारियों के बीच यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि जिस तरह से अनुभव वाले आर्मी अफसरों को सैन्य मामलों के विभाग में तैनात किया गया है, उसी तरह सीएपीएफ के कैडर अफसरों को भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव या संयुक्त सचिव जैसे पदों पर लगाया जा सकता है। सीएपीएफ के पूर्व कैडर अधिकारियों ने भी मौजूदा अफसरों की इस मांग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि 30-35 साल के अनुभव वाले कैडर अफसरों को मौका दिया जाना चाहिए।

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इन सैन्य अफसरों को दिया पद

बता दें कि कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने पांच मई को सैन्य मामलों के विभाग में सेना के चार अधिकारियों को पोस्टिंग देने वाली फाइल को मंजूरी दी थी। डीओपीटी द्वारा जारी आदेशों के मुताबिक, लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी को अतिरिक्त सचिव, मेजर जनरल के. नारायणन, रियर एडमिरल कपिल मोहन धीर और एयर वाइस मार्शल हरदीप बैंस को संयुक्त सचिव के पद पर लगाया गया है। इसके बाद सीएपीएफ में यह मांग उठने लगी है कि कैडर अधिकारियों को गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव या संयुक्त सचिव जैसे पदों पर तैनाती दी जाए। अभी तक ऐसे पदों पर आईएएस और आईपीएस ही तैनात होते रहे हैं।

बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद बताते हैं, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में नए बदलावों को लेकर हमेशा संशय के बादल छाए रहते हैं। कैडर अधिकारियों की क्षमता को कमतर आंका जाता है। यह अलग बात है कि इन अफसरों के पास 35 साल का फील्ड में काम करने का अनुभव होता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लेकर उत्तर-पूर्व के उग्रवाद ग्रस्त इलाके और कश्मीर का आतंकवाद, ऐसी जगहों पर कैडर अधिकारी तैनात रहते हैं। अगर नीति निर्माण में इन अधिकारियों का योगदान लिया जाता है तो वह देशहित में होगा। इन्हें समय पर प्रमोशन देकर अतिरिक्त सचिव या उसके समकक्ष पदों पर लगाया जा सकता है।
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अपने अधिकारों के लिए लड़नी पड़ रही है अदालती लड़ाई

सीएपीएफ में खासतौर पर सीआरपीएफ, बीएसएफ और सीआईएसएफ जैसे बलों के कैडर अधिकारी अपनी पदोन्नति के लिए लंबे समय से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इन बलों की कैडर रिव्यू प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई बलों में अभी तक रिव्यू प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। डीओपीटी के नियमानुसार, हर पांच साल में कैडर रिव्यू जरूरी है। कैडर अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार जानबूझ कर इस प्रक्रिया में देरी कर रही है। पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जून 2021 तक कैडर रिव्यू करने के लिए कहा था, लेकिन बाद में उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई।

नतीजा, सरकार को यह कहने का मौका मिल गया कि अभी ये मामला कोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि अब कोर्ट के हस्तक्षेप से ही सीआरपीएफ मुख्यालय ने ग्रुप-ए एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के कैडर रिव्यू के लिए विभिन्न अधिकारियों वाली सात सदस्यीय कमेटी गठित की है। इस कमेटी को 31 मई तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी है। इसमें चेयरमैन संजय अरोड़ा आईपीएस एडीजी, अजय यादव आईपीएस आईजी, विवेक वैद्य आईजी, बीके शर्मा डीआईजी, निखिल रस्तोगी कमांडेंट, अनुराग सिंह टूआईसी, एके सिंह डिप्टी कमांडेंट और मनुश्री सहायक कमांडेंट शामिल हैं।
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