कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संस्कृति और लोकाचार में माता-पिता का पालन-पोषण पुत्र का पवित्र दायित्व होता है। ऐसे में अगर पत्नी पति पर उसके माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती है, तो पति मानसिक क्रूरता के आधार पर अदालत में जा सकता है और पत्नी को तलाक दे सकता है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में तलाक को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने एक महिला की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति को बिना किसी उचित कारण के उसके माता-पिता से अलग रहने के लिए उसकी पत्नी मजबूर करती है तो ऐसे में वह मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए याचिका दाखिल कर सकता है।
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जानकारी के मुताबिक, मामला एक महिला की याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता महिला अपने पति पर उसके माता-पिता से अलग रहने का दबाव बना रही थी और इसके लिए प्रयासरत थी कि दोनों पति-पत्नी कहीं और रहने लगें। इससे परेशान होकर पति ने परिवार अदालत में याचिका दायर की थी। जिसे परिवार अदालत ने स्वीकार कर लिया और महिला से उसके पति को तलाक देने के लिए कहा। परिवार अदालत के इस आदेश को महिला ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिस पर कलकत्ता हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सौमन सेन और न्यायमूर्ति उदय कुमार की खंडपीठ ने 31 मार्च को फैसला सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी थी।
अदालत ने क्या कहा?
साथ ही हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का पति अपने माता-पिता के साथ रह रहा है। भारतीय संस्कृति और लोकाचार में माता-पिता का पालन-पोषण पुत्र का पवित्र दायित्व होता है। ऐसे में अगर पत्नी पति पर उसके माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती है, तो पति मानसिक क्रूरता के आधार पर अदालत में जा सकता है और पत्नी को तलाक दे सकता है।
2009 में परिवार अदालत ने दी थी मंजूरी
जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर की एक परिवार अदालत ने 2009 में पति को पत्नी से तलाक लेने की मंजूरी दी थीा। पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी उसे प्रताड़ित करती है। उसने परिवार अदालत में दायर अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी सार्वजनिक रूप से उसे जलील करती है और उसे कायर, निकम्मा और बेरोजगार कहती थी।
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