भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने शुक्रवार को गुजरात सरकार के दावे को खारिज कर दिया। दरअसल, गुजरात सरकार ने दावा किया था कि राज्य में कहीं भी पीने के पानी में किसी प्रकार का रासायनिक संदूषण नहीं है, जिसपर सीएजी ने कहा कि यह सही नहीं है।
राज्य विधानसभा में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में, सीएजी ने प्रयोगशाला रिपोर्टों का हवाला दिया और बताया कि 1.30 लाख नमूनों में से 20,000 से अधिक, जो 15 प्रतिशत हैं, 2015-16 में सरकारी प्रयोगशालाओं में किए गए रासायनिक परीक्षा में विफल रहा है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बाद के वर्षों में किए गए परीक्षणों में संदूषण की एक समान प्रवृत्ति पाई गई थी।
वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए 'गुजरात में ग्रामीण पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम' पर कैग की प्रदर्शन लेखा परीक्षा रिपोर्ट राज्य विधानसभा मानसून सत्र के अंतिम दिन शुक्रवार को पेश की गई। रिपोर्ट में सीएजी ने उल्लेख किया कि निर्धारित सीमा से अधिक पीने के पानी में कुछ रसायनों की मौजूदगी से बड़ी बीमारियां हो सकती हैं। जैसे आर्सेनिक कैंसर का कारण बनता है, फ्लोराइड फ्लोरोसिस का कारण बनता है, नाइट्रेट रक्त की क्षमता को बाधित करता है जिससे मस्तिष्क को नुकसान पहुंचता है और लोहा हेमोक्रोमैटोसिस का कारण बनता है।
सीएजी ने आगे कहा कि मार्च 2016 में गुजरात सरकार ने केंद्र से कहा था कि 'राज्य जल गुणवत्ता से प्रभावित नहीं है।' हालांकि, सरकारी लैब रिपोर्टों का हवाला देते हुए, सीएजी ने बताया किया कि '2013-18 के दौरान राज्य में परीक्षण किए गए 6.29 लाख पानी के नमूनों में से, लगभग 1.15 लाख नमूनों, यानी 18.30 प्रतिशत, रासायनिक रूप से अयोग्य पाए गए। इनमें फ्लोराइड, नाइट्रेट और टीडीएस की अधिक मात्रा थी।'
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2013-18 के दौरान नमूनों में नाइट्रेट और फ्लोराइड के संबंध में कुल संदूषण क्रमशः 11.89 प्रतिशत और 4.33 प्रतिशत था। रिपोर्ट के अनुसार, छोटाउदेपुर, दाहोद, बनासकांठा, पंचमहल और वडोदरा में नाइट्रेट का उच्च संदूषण था, जबकि फ्लोराइड संदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित दाहोद, छोटाउदेपुर, बनासकांठा और खेड़ा थे।
लेखापरीक्षा के अनुसार, संयुक्त भौतिक सत्यापन के दौरान एकत्र किए गए 188 नमूनों में से 54 नमूने अयोग्य पाए गए। हालांकि, पानी दूषित था फिर भी लोग इन स्रोतों से पीने और खाना पकाने के प्रयोजनों के लिए पानी का उपयोग कर रहे थे, क्योंकि इन बस्तियों में रहने वालों के पास कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं था। एक स्पष्ट खंडन में, सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 'राज्य सरकार का दावा है कि एक भी बस्ती गुणवत्ता प्रभावित नहीं थी, यह सही नहीं है।'