उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक पकड़ कमजोर होती दिख रही है तो दिल्ली में भी पार्टी का संगठन निष्प्राण हो चुका है। 2008 के विधानसभा चुनाव में 14 प्रतिशत वोट से ज्यादा मत हासिल कर चुनावी पंडितों को चौंकाने वाली बसपा अब दिल्ली में अपने अस्तित्व से जूझ रही है। आम आदमी पार्टी के गठन के बाद से बसपा दिल्ली में लगातार कमजोर हो रही है। पिछले विधानसभा चुनाव मेंं उसेे केवल 0.58 प्रतिशत मत ही हासिल हुए। दलित वोटरों को अपना बनाने के लिए आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में खूब रस्साकशी चल रही है।
क्या है बसपा की शक्ति
अनुसूचित जाति वर्ग के वोटर बहुजन समाज पार्टी की सबसे बड़ी शक्ति हैं। दिल्ली की 70 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग एक दर्जन सीटों पर दलित समुदाय के लोग बहुतायत संख्या में रहते हैं। कुल मतदाताओं में लगभग 25 लाख अनुसूचित जाति के मतदाता राजधानी में रहते हैं। राजधानी की 12 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित भी हैं। दलित मतदाता इन सीटों पर लगभग अकेले दम पर किसी पार्टी की जीत या हार तय करने की स्थिति में हैं। यही कारण है कि बसपा इन क्षेत्रों को अपनी सबसे अधिक संभावना वाली सीटों के तौर पर देखती है।
कैसा रहा प्रदर्शन
दिल्ली के चुनावी इतिहास में बसपा ने 1993 के विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई थी। इस चुनाव में उसने 55 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे लेकिन उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली। पार्टी को इस चुनाव में 1.88 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। 1998 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 5.76 प्रतिशत वोट और 2003 के चुनाव में 8.96 प्रतिशत वोट हासिल हुए। बसपा ने 2008 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर सफलता हासिल की थी। उसके पांच उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे और पार्टी ने 14.05 प्रतिशत वोट हासिल किया। यह उसका अब तक का सर्वोच्च प्रदर्शन है। इसके बाद पार्टी यह सफलता कभी दोहरा नहीं सकी।
2012 में आम आदमी पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद दलित मतदाताओं ने उसकी तरफ झुकाव कर लिया और बसपा की ताकत घटती चली गई। 2013 के चुनाव में पार्टी को 5.35 प्रतिशत वोट और 2015 के चुनाव में 1.30 प्रतिशत वोट हासिल हुए। विधानसभा चुनाव 2020 में बसपा ने दिल्ली की सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन 1,47,03,692 मतदाताओं वाली राजधानी में बसपा को केवल 0.58 प्रतिशत वोट मिले।
वापसी करेंगे
एक बसपा नेता के अनुसार, पूरे देश में मतदाताओं में एक ट्रेंड देखा जा रहा है कि अब वह निर्णायक भूमिका अदा करना चाहता है। वह केवल प्रतीकात्मक तौर पर वोटिंग न कर अपने वोट का परिणाम सत्ता के रूप में देखना चाहता है। संभवतः यही कारण है कि राजधानी में वह विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट करने लगा है। लेकिन उनकी पार्टी दिल्ली में वापसी के लिए पूरी तरह तैयार है और इसके लिए अभी से रणनीति बनाई जा रही है।
भाजपा की हिस्सेदारी कितनी
दिल्ली भाजपा प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने अमर उजाला से कहा कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने दिल्ली की सभी लोकसभा सीटें जीती। ये दलित समुदाय के भरपूर समर्थन के बिना संभव नहीं है। इसी प्रकार पार्टी को 2012 और 2017 के नगर निगम चुनावों में भी पार्टी को उन वार्डों में खूब सफलता मिली जहां दलित समुदाय के लोगों की बहुलता है। इससे साबित होता है कि पार्टी की दलित वोटरों पर पकड़ अच्छी रही है। भाजपा राजधानी में 11 हजार माइक्रो लेवल की बैठकें कर रही है। वह इन वर्गों तक अपनी पकड़ एक बार फिर मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 47.82 प्रतिशत वोटों के साथ 49 सीटों पर सफलता मिली थी। इसमें आरक्षित सीटों पर भी उसके लगभग सात उम्मीदवार विजयी रहे थे। लेकिन बाद के वर्षों में राजधानी में उसका अनुसूचित वर्ग के वोटरों पर पकड़ कुछ कमजोर हो गई जिससे उसकी दिल्ली की सत्ता पर दावेदारी भी कमजोर हुई। लेकिन पार्टी अब दुबारा मजबूती के साथ दलित वर्गों में अपनी भागीदारी बढ़ाने पर विचार कर रही है।
प्रवीण शंकर कपूर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने पूरे देश के दलितों के उत्थान के लिए बड़ा काम किया है। बाबा साहब अंबेडकर के कार्यों की पहचान बढ़ाने के अलावा दलित वर्ग की केंद्रीय कैबिनेट से लेकर पार्टी संगठन में भूमिका बढ़ाई जा रही है। केंद्र सरकार उनके लिए अनेक योजनाओं के जरिए दलित वर्गों का विकास कर रही है। इसका असर हुआ है कि दलित समुदाय ने खुलकर प्रधानमंत्री का समर्थन किया है और इसी समर्थन का असर 2019 में दिखाई पड़ा था। पार्टी दलित समुदाय का यह विश्वास दुबारा जीतने के लिए विभिन्न स्तर पर प्रयास कर रही है।
आप के आगे सब बेहाल
दलित समुदाय के वोटरों पर भाजपा और बसपा के अपने-अपने दावों के बीच आम आदमी पार्टी ने जब से राजधानी में अपनी पकड़ मजबूत बनाई है, दलित समुदाय का उसे खूब समर्थन मिला है। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को सभी आरक्षित सीटों पर सफलता मिलना इसका सबसे बड़ा संकेत माना जा सकता है। हालांकि, 2017 के नगर निगम चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसकी यह पकड़ मजबूत नहीं रही जिसके अलग-अलग कारण बताए जा सकते हैं।
आप सांसद संजय सिंह के मुताबिक, दलित समुदाय ने देख लिया है कि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के साधन देने में अरविंद केजरीवाल सबसे ज्यादा प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं। यही कारण है कि इस वर्ग के साथ-साथ हर वर्ग के वोटरों पर आम आदमी पार्टी की पकड़ मजबूत हो रही है। उन्होंने कहा कि आगामी नगर निगम चुनाव के साथ-साथ आम आदमी पार्टी पांच विधानसभा चुनावों में भी अच्छी सफलता दर्ज करेगी।