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कोरोना की बूस्टर खुराक: क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों के बाद संभव होगी वैक्सीन की तीसरी डोज, म्यूटेशन खत्म करने में होगी कारगर!

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 17 Nov 2021 05:08 PM IST

सार

भारत के भी कई राज्यों में कोरोना के बढ़ते मामलों के बाद बूस्टर डोज की जरूरत महसूस होने लगी है। ऐसे में भारत ने भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। भारत जल्द ही कोविड-19 वैक्सीन की बूस्टर खुराक (तीसरी खुराक) देने पर एक नीति दस्तावेज जारी करेगा...
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टीकाकरण - फोटो : पीटीआई (फाइल)


नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन ही कोरोना वैक्सीन पर सरकार को सलाह देती है, फिर चाहे वो वैक्सीन की दो डोज के बीच गैप को लेकर हो या दिनों का निर्धारण। बूस्टर डोज को लेकर भी ये ग्रुप सरकार को राय देगा। जानकारी के मुताबिक ये पॉलिसी अगले दो से तीन महीने में तैयार की जाएगी। फिलहाल तीसरी वैक्सीन डोज यानी बूस्टर डोज के क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों पर सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन का एनालिसिस चल रहा है, इस पर फैसला होने के बाद ही कोई पॉलिसी बनाई जाएगी।


इधर, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में बूस्टर डोज की जरुरत है या नहीं, इसके लिए पहले पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध कराने होंगे और उसके बाद उन आंकड़ों की निगरानी करनी होगी। यह देखना होगा कि जिन्हें संक्रमण हुआ था क्या उन्हें दोबारा संक्रमण हो रहा है और यदि हो रहा है तो बीमारी कितनी गंभीर हो रही है। यदि हल्के लक्षण दिख रहे हों तो यह भी देखना होगा कि वैक्सीन की बूस्टर डोज देने से फायदा ज्यादा है या रिस्क। इन सभी बातों का वैज्ञानिक तरीके से आकलन करने के बाद ही कोरोना संक्रमण के मामले में बूस्टर डोज देने का निर्णय लेना चाहिये।

इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए बूस्टर डोज

सफदरजंग अस्पताल के प्रोफेसर, निदेशक कम्यूनिटी मेडिसिन डॉ. जुगल किशोर ने अमर उजाला को बताया कि बूस्टर डोज का मतलब है, किसी वैक्सीन की प्राथमिक डोज लगने के बाद बीमारी से बचाव के लिए एक और डोज और लगाई जाए। ये डोज तब लगाई जाती है जब प्राथमिक डोज लगने के बाद इम्यूनिटी कम होने लगती है। लिहाजा इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए बूस्टर डोज लगाई जाती है। यह डोज तब लगनी चाहिए जब भविष्य में संक्रमण का खतरा बना रहे। फिल्हाल कोरोना के केस अधिकांश राज्यों में नियंत्रण में हैं। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इस डोज का निर्णय लेना बहुत फायदेमंद नहीं होगा।



किशोर ने आगे बताया कि बूस्टर डोज पर एक्सपर्ट कमेटी काम रही है जो इस पर निर्णय लेगी। हालांकि क्लीनिकल समझ यह कहती है कि सभी लोगों को बूस्टर डोज की जरूरत नहीं पड़नी चाहिये। ज्यादातर आबादी को संक्रमण हो चुका है और वैक्सीन भी लग गई है और अभी तक ये लोग ठीक भी हैं। जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है या ऐसी बीमारी है जिससे शरीर में इम्यूनिटी नहीं रह पाती है, ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें बूस्टर डोज दी जा सकती है। बूस्टर डोज से ज्यादा अच्छा यह कहना होगा कि वैक्सीन की प्राथमिक डोज के बाद भी वैक्सीन दी जाए। जैसे अभी फ्लू या इन्फ्लूएंजा में हर वर्ष वैक्सीन दी जाती है।

नए वैरिएंट के लिए बूस्टर डोज कारगर

कोरोना वायरस में बदलाव होता है तो कोविड रोधी वैक्सीन की बूस्टर डोज की आवश्यकता होगी। दरअसल इस साल कोरोना के डेल्टा वैरिएंट ने देश में काफी तबाही मचाई थी और अभी भी कई देशों में इसका कहर जारी है। ऐसे में विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है और उनका मानना है कि अगर आने वाले वक्त में वायरस में म्यूटेशन यानी बदलाव होता है तो उससे बचने के लिए लोगों को कोरोना वैक्सीन की बूस्टर डोज की जरूरत होगी।



हाल ही में भारत बायोटेक के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डा. कृष्णा एला ने भी कहा था कि यदि आने वाले दिनों में कोरोना वायरस में फिर कोई नया बदलाव होता है, तो लोगों को कोविड रोधी वैक्सीन की बूस्टर डोज की जरूरत होगी। उन्होंने कहा था कि यदि कोरोना का कोई नया वैरिएंट आता है और वैक्सीन की बूस्टर डोज की जरूरत पड़ती है तो इसे फास्ट ट्रैक के आधार पर कैसे वितरित किया जा सकता है हम उस पर काम कर रहे हैं।

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