बॉम्बे हाईकोर्ट ने एल्गार परिषद और माओवादी मामले में कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज की ओर से दाखिल की गई जमानत याचिका पर फैसला सुरक्षित कर लिया है। इस याचिका के विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार ने बुधवार को हाईकोर्ट में बताया कि सत्र अदालत के पास इस आरोपपत्र को 2019 में संज्ञान में लेने की शक्ति थी। क्योंकि, तब तक राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए)ने इस मामले में अपनी जांच नहीं शुरू की थी।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने जस्टिस एसएस शिंदे और एनजे जामदर की पीठ से कहा कि जब तक किसी मामले कि जांच एनआईए को नहीं सौंपी जाती है, तब तक ही उससे संबंधित कार्यवाही नियमित अदालत में जारी रह सकती है। जबकि, सुधा भारद्वाज ने इस साल की शुरुआत में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए जमानत याचिका दाखिल की थी।
उन्होंने दलील दी कि 2019 में दाखिल इस मामले की चार्जशीट का संज्ञान पुणे के अतरिक्त सत्र न्यायाधीश केडी वडाने ने लिया था। जबकि, वह इसके लिए अधिकृत नहीं थे। इस मामले में सुधा भारद्वाज की ओर से हाईकोर्ट से मांगी गई आरटीआई के जवाब में यह सामने आया कि जज वडाने इस मामले में स्पेशल जज नहीं नियुक्त किए गए थे। जबकि, यूएपीए के तहत अपराधों की रोकथाम के लिए यह आवश्यक है।
भारद्वाज की ओर से इस मामले में पेश हुए वरिष्ठ वकील युग चौधरी ने हाईकोर्ट को बताया कि वडाने ने खुद को स्पेशल जज के तौर पर पेश किया और कई मामलों में हस्ताक्षर भी किए हैं। बुधवार को युग चौधरी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कुछ आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि यूएपीए मामलों को रोकने के लिए स्पेशल कोर्ट हैं, जिसको कुछ अधिकार दिए गए हैं।
हालांकि, महाराष्ट्र सरकार के अधिवक्ता कुंभकोनी ने युग चौधरी की ओर से दी गई दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से सिर्फ वो मामले सामने रखे गए हैं, जो उनके अनुकूल थे और पेश किए गए मामलों में परिस्थितियां अलग थीं। उन्होंने कहा कि, किसी भी आदेश को पढ़ने का एक सिद्धांत है, सिर्फ कुछ हिस्से पढ़कर आप खुद को नक्सली गतिविधियों से मुक्त नहीं कह सकते।
उन्होंने कहा कि हर मामले में तथ्य अलग होते हैं, आप उन तथ्यों को दूसरे मामले में नहीं रख सकते। वहीं, एनआईए की ओर से इस मामले में पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने अदालत से कहा कि सत्र न्यायालय के पास इस मामले को संज्ञान में लेने का अधिकार था। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुधा भरद्वाज की जमानत याचिका में सभी दलीलों को सुनकर अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया।