बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले में 35 साल की बेटी को उसकी मां का कानूनी गार्जियन घोषित किया है। अदालत ने कहा कि कोर्ट कानूनी प्रावधान के बिना भी, मानसिक विकार से पीड़ित शख्स का लीगल गार्जियन नियुक्त करने का अधिकार रखता है। अदालत ने इस अहम मामले में कहा कि मानसिक विकार के मामले में परिवार के सदस्य को लीगल गार्जियन बनाया जा सकता है।
बेटी होगी बीमार मां की कानूनी अभिभावक
परिवार के किसी सदस्य को नियुक्त करने का आधार स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा, भले ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन अदालत ऐसा कर सकती है। इस टिप्पणी के साथ ही मेडिकल रिपोर्ट पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने एक बेटी को उसकी बीमार मां का कानूनी अभिभावक नियुक्त कर दिया।
किन जजों की पीठ ने सुनाया फैसला, क्या है मामला?
बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस सुनील शुक्रे और जस्टिस फिरदोश पूनीवाला की खंडपीठ ने 6 अक्तूबर को आदेश पारित किया। आदेश के आधार पर 35 वर्षीय महिला को अल्जाइमर रोग से पीड़ित मां का कानूनी अभिभावक नियुक्त किया गया। हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश मंगलवार को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के दिन सामने आया।
बड़े अभिभावक के रूप में अदालत की भूमिका
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम या हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित किसी वृद्ध व्यक्ति के बच्चे या भाई-बहन को कानूनी अभिभावक के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान नहीं करता है। ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि परिवार के किसी सदस्य को लीगल गार्जियन बनाया जा सके, लेकिन ऐसी विशेष परिस्थिति में अदालत बड़े अभिभावक की तरह काम कर सकती है और ऐसे मामलों में आश्रित व्यक्ति के सर्वोत्तम हित में उचित निर्णय ले सकती है।
बेटी किस आधार पर गार्जियन बनना चाहती थी?
अदालत ने कहा, गार्जियनशिप (Guardianship) का अंतर्निहित विचार देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले व्यक्ति की सुरक्षा और कल्याण है। महिला ने अपनी याचिका में कहा था कि उसकी विधवा मां अल्जाइमर रोग से पीड़ित है। एडवांस स्टेज की इस बीमारी के कारण पीड़िता अपनी देखभाल करने में असमर्थ है। इसलिए उसे कानूनी अभिभावक के रूप में नियुक्त किया जाए।
संपत्ति को प्रबंधित करने की अनुमति भी दी
हाईकोर्ट ने दक्षिण मुंबई स्थित जेजे अस्पताल के एक न्यूरोलॉजिस्ट की मेडिकल रिपोर्ट पर गौर करते हुए फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा, जब कोई व्यक्ति इस हद तक दूसरों पर निर्भर हो जाता है, तो साफ है कि जिस व्यक्ति पर देखभाल की जिम्मेदारी आती है उसके लिए देखभाल और सुरक्षा प्रदान करना कानूनी मान्यता के बिना संभव नहीं। पीठ ने याचिकाकर्ता को उसकी मां की चल और अचल संपत्तियों को संचालित करने या प्रबंधित करने की अनुमति भी दे दी।