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Telangana: तेलंगाना में कमजोर पड़ा भाजपा का चुनावी अभियान, बीआरएस को मिल सकती है बढ़त, कांग्रेस ने घेरा

अमित शर्मा
Updated Sun, 17 Sep 2023 02:27 PM IST

सार

कर्नाटक की हार ने भी भाजपा के दक्षिण के एक और राज्य में सरकार बनाने के उसके मंसूबों पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं। कर्नाटक का असर तेलंगाना में पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी दिखाई पड़ रहा है। पार्टी के राज्य स्तरीय शीर्ष नेताओं के साथ-साथ केंद्रीय नेताओं की पूरी कोशिश के बाद भी पार्टी से शुरू हुई भगदड़ अब तक नहीं रुकी है।
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भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, बीआरएस अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे - फोटो : सोशल मीडिया


भाजपा ने बंडी संजय कुमार को तेलंगाना में पार्टी की कमान सौंपकर बीआरएस को घेरने का जोरदार प्लान बनाया था। संजय कुमार ने भी केंद्रीय नेतृत्व की मंशा को भांपते हुए राज्य सरकार पर जोरदार हमला बोला। बार-बार विभिन्न मुद्दों पर धरना-प्रदर्शन कर राज्य सरकार के खिलाफ एक माहौल खड़ा कर दिया। लेकिन नए समीकरणों में पार्टी ने बंडी संजय कुमार को तेलंगाना भाजपा के अध्यक्ष पद से हटाकर जी किशन रेड्डी को पार्टी की कमान सौंप दी। 


लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी के इस फैसले से तेलंगाना में उसकी लड़ाई कमजोर पड़ गई है। नए अध्यक्ष उतने प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। पार्टी ने अपनी चुनावी कमान जिस एटला राजेंद्र को सौंपी है, वे भी पूर्व में केसीआर के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के बीच तेलंगाना में भाजपा की लड़ाई की प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े हो गए हैं।    


अमित शाह ने बोला हमला

हालांकि, भाजपा का दावा है कि तेलंगाना में उसका चुनावी अभियान पूरी आक्रामकता के साथ चल रहा है। 17 सितंबर को भी गृह मंत्री अमित शाह ने तेलंगाना मुक्ति दिवस पर कांग्रेस-बीआरएस पर जमकर हमला बोला और आरोप लगाया कि राज्य के लोगों को आजादी के 75 साल बाद भी उनका अधिकार नहीं मिल सका है और युवाओं की अपेक्षाएं अभी भी पूरी नहीं हो पाई हैं।   


भाजपा नहीं पेश कर पाई बीआरएस की राजनीति की काट

तेलंगाना की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक बाला स्वामी मानते हैं कि भाजपा की पूरी चुनावी लड़ाई सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इर्द गिर्द सिमटी होती है, लेकिन इस राज्य में उसकी वह रणनीति सफल नहीं हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि तेलंगाना सरकार ने हर धर्म, हर जातियों के लिए विभिन्न योजनाएं बनाकर उनके बीच अपनी विश्वसनीयता मजबूत की है। यही कारण है कि भाजपा का हिन्दुत्व का कार्ड यहां अपना असर दिखाता नहीं दिखाई पड़ रहा है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर वह यहां की लड़ाई में पिछड़ रही है। 


कर्नाटक की हार ने भी भाजपा के दक्षिण के एक और राज्य में सरकार बनाने के उसके मंसूबों पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं। कर्नाटक का असर तेलंगाना में पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी दिखाई पड़ रहा है। पार्टी के राज्य स्तरीय शीर्ष नेताओं के साथ-साथ केंद्रीय नेताओं की पूरी कोशिश के बाद भी पार्टी से शुरू हुई भगदड़ अब तक नहीं रुकी है। इसका लाभ सत्तारूढ़ बीआरएस को मिल रहा है।       




'विपक्ष की लड़ाई कमजोर होने से बीआरएस को लाभ'

जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ तेलंगाना के अध्यक्ष बाला स्वामी ने अमर उजाला को बताया कि तेलंगाना की चुनावी लड़ाई विपक्ष के कमजोर हमलों के कारण इस समय सत्ता पक्ष की ओर झुकी हुई है। तमाम मुद्दों को लेकर उसके विरुद्ध जनता में कुछ आक्रोश तो है, लेकिन विपक्ष इस आक्रोश को भुनाने में अब तक असफल साबित हुआ है। 
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कांग्रेस ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बहाने बीआरएस सरकार को घेरने की योजना बनाई है। उसके पोस्टरों में भी सरकार पर जमकर हमलेे किए गए हैं। लेकिन इस लड़ाई को जमीन पर ले जाए बिना लाभ मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। वहीं, उलटे अनेक कल्याणकारी योजनाओं के सहारे चुनावी वर्ष में भी सरकार जनता को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रही है। इसमें उसे सफलता मिलती भी दिखाई पड़ रही है। भाजपा की चुनावी लड़ाई कमजोर पड़ने से भी बीआरएस को बढ़त मिलती दिखाई पड़ रही है। 




गरीबों में क्यों हुई लोकप्रिय

दरअसल, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने समाज के हर वर्ग तक अपनी पहुंच बनाने की जो रणनीति अपनाई थी, वह कारगर हो रही है। समाज के किसी भी वर्ग की लड़कियों के विवाह के लिए 1.16 लाख रुपये नकद की सहायता उन्हें महिलाओं और गरीब वर्गों में बहुत लोकप्रिय बना रही है। देश के किसी भी राज्य में गरीब लड़कियों के विवाह के लिए इतनी आर्थिक सहायता नहीं दी जा रही है। अन्य विभिन्न योजनाओं से भी सरकार ने गरीब वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का काम किया है। यही कारण है कि समाज के सबसे निचले तबकों पर केसीआर की पकड़ मजबूत बनी हुई है और यह पकड़ निर्णायक बढ़त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।
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