असहयोग आंदोलन खत्म होने के बाद चंद्रशेखर की विचारधारा में बदलाव आया और वह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए। वह हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिक आर्मी में शामिल हो गए। उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी कांड, सांडर्स-हत्या को अंजाम दिया। उनके साथियों के छोटे से समूह ने अंग्रेजों को परेशान कर दिया था।
अंग्रेजों ने पकड़ने के लिए रखा इनाम
पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए उन पर 5,000 रुपये का इनाम भी रखा। लेकिन वह वेश बदलकर आसानी से अपनी योजनाओं को अंजाम देते रहे। उस समय में 5 हजार रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।
कैद से बचने के लिए खुद को मारी गोली और हो गए आजाद
अंत में 27 फरवरी 1931 के दिन पुलिस ने उन्हें इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया था। वह आजाद थे और कभी कैद में नहीं आना चाहते थे इसलिए उन्होंने स्वयं गोली चलाकर अपनी जान दे दी और सदा के लिए आजाद हो गए। उन्हीं के बलिदान से प्रेरित होकर देश के हजारों युवा स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े। आखिरकार उनका सपना 15 अगस्त 1947 को पूरा भी हुआ और भारत विदेशी चंगुल से छूट हमेशा के लिए आजाद हो गया।