भोपाल गैस त्रासदी
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सरकार ने 1984 के भोपाल गैस कांड के पीड़ितों के लिए मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। गौरतलब है कि यूनियन कार्बाइड से जुड़े इस मामले में 2010 में ही उपचारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) दाखिल हुई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में फैसला सुरक्षित रख लिया था। अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक, केंद्र सरकार स्वयं बीमा पॉलिसी जारी करने में विफल रही।
आइये जानते हैं कि भोपाल गैस कांड में अभी क्या हुआ है? केंद्र सरकार की मांग क्या थी? पूरा मामला क्या है? दो-तीन दिसंबर की रात क्या हुआ था?
सुप्रीम कोर्ट
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भोपाल गैस कांड में अभी क्या हुआ है?
सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने मंगलवार को भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन से अतिरिक्त मुआवजे का दावा करने वाली केंद्र की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सेलटमेंट को केवल धोखाधड़ी के आधार पर रद्द किया जा सकता है, लेकिन भारत सरकार ने धोखाधड़ी का कोई आधार नहीं दिया। हालांकि, न्यायालय ने निर्देश दिया कि आरबीआई के पास पड़ी 50 करोड़ रुपये की राशि केंद्र सरकार द्वारा लंबित दावों को पूरा करने के लिए उपयोग की जानी चाहिए, यदि कोई हो। न्यायमूर्ति एस.के. कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति ए.एस. ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि केंद्र की उपचारात्मक याचिका का कानूनी सिद्धांतों में कोई आधार नहीं है।
bhopal gas tragedy
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क्या थी केंद्र सरकार की मांग?
केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में कहा था कि 1989 में जब सुप्रीम कोर्ट ने हर्जाना तय किया था, तब 2.05 लाख पीड़ितों को ध्यान में रखा गया था। इन वर्षों में गैस पीड़ितों की संख्या ढाई गुना से अधिक बढ़कर 5.74 लाख से अधिक हो चुकी है। ऐसे में हर्जाना भी बढ़ना चाहिए। यदि सुप्रीम कोर्ट हर्जाना बढ़ाने को मान जाता तो इसका लाभ भोपाल के हजारों गैस पीड़ितों को मिलेगा।
क्या है पूरा मामला?
भोपाल गैस हादसे के 39 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एसके कौल की संविधान पीठ ने 1989 में तय किए गए 725 करोड़ रुपये हर्जाने के अतिरिक्त 675.96 करोड़ रुपये हर्जाना दिए जाने की याचिका पर यह फैसला दिया है। यह याचिका केंद्र सरकार ने दिसंबर 2010 में लगाई थी और फैसला 12 साल बाद आया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में डाउ केमिकल्स (यूनियन कार्बाइड को खरीदने वाली कंपनी) ने साफ किया था कि वह एक रुपया भी और देने को तैयार नहीं है।
भोपाल गैस कांड की जानकारी
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दो-तीन दिसंबर 1984 की रात क्या हुआ था?
2-3 दिसंबर की आधी रात को अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन की भारतीय सहायक कंपनी के कीटनाशक बनाने वाले प्लांट से 40 टन मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के प्लांट नंबर सी से यह रिसाव हुआ था। दरअसल, 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट के टैंक नंबर 610 में पानी आ गया था, जिससे लीक हुआ था।
इसका नतीजा यह हुआ कि अत्यंत जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस हवा में घुल गई। जहरीली गैसों का गुबार उठा और उसने पूरे इलाके को अपने घेरे में ले लिया। कई लोग तो नींद में ही चल बसे। मध्य प्रदेश सरकार के अनुमान के मुताबिक 3,787 लोगों की मौत हुई थी। वहीं, इससे प्रभावितों की संख्या 5 लाख से अधिक है।
मिथाइल आइसोसाइनेट गैस काफी जहरीली होती है। सिर्फ तीन मिनट का संपर्क ही जान लेने के लिए काफी है। उस रात सब इतना अचानक हुआ कि लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला, वहीं डॉक्टर भी नहीं समझ पाए कि पीड़ितों का इलाज कैसे करें। कौनसी दवा दी जाए।
भोपाल गैस कांड
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लीक के बाद क्या हुआ?
मौतें तो हुईं ही, भोपाल की बड़ी आबादी ने खांसी, आंखों और त्वचा में जलन और सांस लेने में दिक्कत होने की शिकायत की। हजारों लोग अंधे हो गए। कई लोगों को छाले पड़ गए। 1984 में भोपाल में ज्यादा अस्पताल भी नहीं थे। सरकार के दो अस्पताल थे, जिसमें शहर की आधी आबादी का इलाज नहीं हो सकता था। इतनी बड़ी संख्या में लोग अचानक अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर भी कारण नहीं समझ सके थे।
भोपाल गैस त्रासदी
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क्या लीक का प्रभाव खत्म हो गया?
लीक की वजह से कई लोगों पर दूरगामी परिणाम हुए। गैस के संपर्क में आए हजारों लोगों ने शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को जन्म दिया। प्रभावित इलाके में जन्मे बच्चों के हाथ-पैर में विकार दिखाई दिए। कई बच्चों में तो एक से अधिक अंग भी थे। शिशुओं की मौत बढ़कर 300 प्रतिशत हो गई थी। कुछ लोग तो आज भी इस गैस के संपर्क में आने की वजह से विकारों से जूझ रहे हैं।
भोपाल गैस त्रासदी पर सरकार ने क्या कदम उठाए थे?
भारत सरकार की यूनियन कार्बाइड के साथ ही अमेरिका के बीच लंबी कानूनी कार्यवाही हुई। सरकार ने मार्च 1985 में भोपाल गैस लीक एक्ट बनाया। इसने पीड़ितों के कानूनी प्रतिनिधि का काम किया। शुरुआत में अमेरिकी कंपनी 5 मिलियन डॉलर की राहत राशि देना चाहती थी। इसे अस्वीकार करते हुए भारत ने 3.3 बिलियन डॉलर की मांग की थी। 1989 में सेटलमेंट हुआ और यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलियन डॉलर देने पर सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने भी गाइडलाइन सेट की। जिन लोगों की मौत हुई, उनके परिवारों को 1 से 3 लाख रुपये दिए गए। आंशिक या पूरी तरह से विकलांग लोगों को 50 हजार से 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। अस्थायी विकलांगता के लिए 25 हजार से 1 लाख रुपये का मुआवजा तय हुआ।
भोपाल गैस पीड़ितों ने न्याय की गुहार करते हुए रैली निकाली।
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क्या किसी को सजा मिली?
7 जून 2010 को भोपाल की एक अदालत ने कंपनी के सात अधिकारियों को दोषी करार दिया गया और दो साल की सजा सुनाई है लेकिन सभी तुरंत जमानत पर रिहा हो गए। उस वक्त यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को मुख्य आरोपी बनाया गया था, पर एंडरसन हादसे के कुछ ही घंटों बाद विदेश भागने में सफल रहा।
1 फरवरी 1992 को भोपाल की कोर्ट ने एंडरसन को फरार घोषित कर दिया था। एंडरसन के खिलाफ कोर्ट ने 1992 और 2009 में दो बार गैर-जमानती वारंट भी जारी किया था, पर उसको गिरफ्तार नहीं किया जा सका। बताया जाता है कि साल 2014 में एंडरसन फ्लोरिडा में गुमनामी की मौत मर गया।