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डीएनए वाला बयान: भागवत का दावा कितना सही, एक शोध में सामने आई ये बात

Fri, 09 Jul 2021 07:56 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली,

सार

2006 में हुए एक शोध से यह बात साबित होने का दावा किया जा रहा है कि भागवत के बयान को विज्ञान का समर्थन हासिल है। नौ अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में यह नतीजा निकाला था कि भारत के अधिकांश मुसलमानों में केवल सांस्कृतिक बदलाव हुआ, परंतु उनके जींस नहीं बदले।
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मोहन भागवत - फोटो : ANI
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विस्तार
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सभी भारतीयों का डीएनए एक है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान को 2006 में हुए एक शोध के आधार पर विज्ञान का समर्थन हासिल होने का दावा किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि नौ अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों ने यह अपने शोध में यह नतीजा निकाला था कि भारत के अधिकांश मुसलमानों में केवल सांस्कृतिक बदलाव हुआ, उनका जींस नहीं बदला। यह शोध पत्र नवंबर 2006 में एचयूएम जेनेटिक में 543, और 551 में प्रकाशित होने का दावा किया जा रहा है।

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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कुछ दिनों पहले कहा था कि हिंदू- मुस्लिम एकता की बातें भ्रामक हैं क्योंकि यह दोनों अलग नहीं बल्कि एक है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है, चाहें वो किसी भी धर्म के क्यों न हो। भागवत के इस बयान की खूब चर्चा हुई और अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं भी आईं। इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज के रिटार्यड प्रिंसिपल डॉ राम श्रीवास्तव के मुताबिक डीएनए को लेकर संघ प्रमुख ने जो बयान दिया है कि वह बात विज्ञान के आधार पर ठीक है और तर्कसंगत है।

नौ अलग-अलग देशों को वैज्ञानिकों ने किया शोध
प्रोफेसर श्रीवास्तव बताते हैं कि 2006 मे यूनाइटेड नेशन की नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हेल्थ में  नौ अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों ने दुनिया के कई देशों के मुसलमानों की जींस का अध्ययन करके उसकी तुलना अरब देश के मुसलमानों के जींस से की. उनके मुताबिक शोध में यह पाया गया कि हिंदुस्तान के अधिकांश मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन कराया लेकिन उनका जींस नहीं बदला, जैसे कि चीन और मध्य एशिया जैसे अन्य स्थानों पर देखा गया है।
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शोध करने वालों में रमाना गुटाला, डेनिस आर कार्वाल्हो-सिल्वा, ली जिन, ब्रेंडिस यांगवाडोटिर,  वसंती अवधानुला,  खाजा नन्ने, लालजी सिंह,  रणजीत चक्रवर्ती और क्रिस टायलर-स्मिथ इस शोध में शामिल रहे. प्रमुख शोध चिकित्सा विभाग, टेक्सास विश्वविद्यालय स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र, सैन एंटोनियो, यूएसए और सेंटर फॉर जीनोम इंफॉर्मेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी, यूएसए ने किया। 

शोध पत्र में कहा गया है कि अरब सेना ने 711 ईस्वी में सिंधु डेल्टा क्षेत्र पर विजय प्राप्त की। उस समय दक्षिण एशिया के बाकी हिस्सों में उनका प्रभाव मुश्किल से महसूस किया गया था। दसवीं शताब्दी के अंत तक, मध्य एशियाई मुसलमान उत्तर-पश्चिम से भारत में चले आए और पूरे उपमहाद्वीप में फैल गए। मुस्लिम समुदाय अब भारत में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक धर्म है, जिसमें एक अरब से अधिक की हिंदू आबादी में 138 मिलियन से अधिक लोग शामिल हैं।

भारत में इस्लाम का विस्तार एक विशुद्ध सांस्कृतिक घटना थी या स्थानीय आबादी पर इसका आनुवंशिक प्रभाव था। इस प्रश्न को पुरुष दृष्टिकोण से समझने के लिए, शोधकर्ताओं ने आंध्र प्रदेश के 246 मुसलमानों में वाई क्रोमोसोम से आठ माइक्रोसेटेलाइट और 16 बाइनरी मार्कर टाइप किए, और उनकी तुलना चीन, मध्य एशिया, भारत के अन्य हिस्सों के 4,204  लंका, पाकिस्तान, ईरान, मध्य पूर्व, तुर्की, मिस्र और मोरक्को के पुरुषों के आंकड़ों से की। 

भारत के अधिकांश मुसलमानों में अरब देश के निवासियों का कोई अपभ्रंश नहीं
शोधपत्र में दावा किया जा रहा है कि इन वैज्ञानिकों ने चीन में रहने वाले मुसलमान और सामान्य लोगों के जींस का अध्ययन किया। उसकी तुलना अरब के मूल निवासियों के जींस से की। उन्होंने पाया कि चीनी मुसलमानों में और मध्य एशिया के इस्लामिक धर्म मानने वालों के जींस में अरब देशों के मूल निवासियों के जींस का अंश पाया गया। इसी तरह के अरब देश के मूल निवासियों के जींस के अंश श्रीलंका, इंडोनेशिया और दुनिया में फैले हुए अन्य देशों के मुसलमानों के जींस में पाए गए। लेकिन भारत मे दक्षिण और उत्तर भारत के इस्लाम धर्म मानने वाले अधिकांश मुसलमानों के जींस का हिंदू धर्म मानने वाले भारतीय नागरिकों के जींस से जब तुलना की गई तो हिंदू और मुस्लिम के जींस में समानता पाई गई।

शोध में यह निष्कर्ष निकला कि हिन्दुस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों में अरब देश के मूल निवासियों का कोई अपभ्रंश नहीं पाया गया। इस शोध से यह भी पता चला कि अरब देश के आक्रांताओं ने भारत में आकर सिर्फ सांस्कृतिक प्रसार किया और इस्लाम धर्म का प्रचार किया, लेकिन समुदाय की प्रजाति में किसी प्रकार का जेनेटिक अशुद्धियां नहीं आई। शोध के मुताबिक मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच विवाह होने के बावजूद, भारत में इस्लाम धर्म विस्तार मुख्य रूप से एक सांस्कृतिक परिवर्तन था और जीन प्रवाह नहीं हुआ, जैसा कि चीन और मध्य एशिया जैसे अन्य स्थानों में देखा गया है।
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