केंद्र सरकार की ओर से कुछ बैंकों के निजीकरण की घोषणा किए जाने के विरोध में बैंक सेवाओं से जुड़े करीब 50 हजार कर्मचारी, अधिकारी बीते सोमवार से दो दिवसीय हड़ताल पर चले गए हैं। ऐसे में मंगलवार को बैंक हड़ताल के दूसरे दिन भी महाराष्ट्र में बैंक सेवाओं पर असर दिखाई दिया।
हड़ताल की वजह से बैंकों से नकदी निकालने, चेक क्लीयरेंस और दूसरे कार्यों पर असर देखा गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की नौ यूनियनों के संयुक्त मंच ‘यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) के आह्वान पर यह हड़ताल की गई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले महीने आम बजट पेश करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों के निजीकरण की घोषणा की है।
यूएफबीयू का दावा है कि हड़ताल के पहले दिन 15 मार्च को करीब दो करोड़ चेक की क्लीयरेंस प्रभावित हुई हैं, जिनमें 16,500 करोड़ रुपये तक भुगतान अटक गया। पहले दिन कई बैंकों के एटीएम में नकदी भी समाप्त हो चली थी। अकेले मुंबई में ही करीब 86 लाख चेक और दूसरे उपकरणों को क्लीयर नहीं कर पाए, जिसमें 6,500 करोड़ रुपये का भुगतान आगे नहीं हो पाया।
आल इंडिया बैंक एम्पलॉइज एसोसिएशन (एआईबीईए) ने एक वक्तव्य में कहा है कि बैंकों का निजीकरण करना समस्या का हल नहीं है। यह विकासशील भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से नकारात्मक कदम है।
वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के खिलाफ दो दिवसीय हड़ताल का मुद्दा मंगलवार को संसद में गूंजा। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे को उठाते हुए समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से बयान देने की मांग की। उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए खड़गे ने कहा कि कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने से बैंकों का कामकाज ठप पड़ गया है और आम जनता से लेकर कोराबारी तक इससे परेशान हैं।