नए आईटी नियमावली के तहत डिजिटल न्यूज मीडिया पर कोड ऑफ इथिक्स (नैतिक आचार संहिता) की अनिवार्यता पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने शनिवार को रोक लगा दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 9 (1) और नियम 9 (3) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को नुकसान पहुंचाते हैं। ये आईटी एक्ट 2002 के प्रावधानों का उल्लंघन भी करते हैं। बाकी नियमावली के किसी नियम पर कोई रोक नहीं लगाई गई है, खासतौर से कानून का उल्लंघन करने पर डिजिटल न्यूज मीडिया पर सजा के प्रावधान वाले नियम 9 (2) के लिए कहा गया कि यह बना रहेगा।
कुछ डिजिटल मीडिया संस्थानों द्वारा की गई याचिका पर चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी ने सवाल उठाया कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट के तहत बने ‘पत्रकारिता आचरण के मानक’ को नए आईटी नियमों में ‘आचार संहिता’ की तरह कैसे थोपा जा सकता है? काउंसिल ने तो केवल गाइडलाइन बनाई थीं, उन्हें ऐसा दर्जा कैसे दिया जा सकता है जहां उनका अनुपालन न करने पर सजा दी जाए?
सोचने की भी आजादी नहीं, तो व्यक्त कैसे करेंगे?
हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जब तक आपके पास सोचने की आजादी नहीं होगी, तब तक आप खुद को व्यक्त कैसे करेंगे? सरकार सोचने की आजादी को सीमित कर दे रही है। थोड़ी सी भी चूक होने पर सजा का प्रावधान बनाया जा रहा है।
याचियों के तर्क
याचिकाकर्ताओं के वकील डेरियस खंभात ने कहा कि यह कानून बेहद निर्मम हैं, इनका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गहरा असर होगा। दूसरे वकील अभय नेवागी ने कहा कि इनसे सरकार को ऐसी निरंकुश शक्तियां हासिल हो रही हैं, जिनसे वह सूचनाओं को लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए उन्हें मिटा, बदल या ब्लॉक भी कर सकती है।
सरकार के तर्क
सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा था कि अगर मौजूदा याचिका में राहत दी गई तो इसका व्यापक असर होगा। बल्कि फेक न्यूज और कानूनी रूप से प्रतिबंधित सामग्री को फैलाया जा सकता है।
बाकी मामलों में फिलहाल निर्णय नही
अन्य नियमों पर हाईकोर्ट ने कोई राहत याचियों को नहीं दी। नियम 14 में डिजिटल मीडिया की कार्यप्रणाली जांचने के लिए अंतर-विभागीय समिति बनाने का प्रावधान है, लेकिन समिति बनी है, इसलिए याचियों को समिति बनने के बाद ही कोई आपत्ति होने पर उसे उठाने के लिए कहा गया है।