जीरादेई का हृदयस्थल। विराट। सौम्य। विशिष्ट। पर यह धारणा ज्यादा देर तक टिकी नहीं रहती। उनके पुराने घर की टूटी खपरैल की तरह, इस धारणा को तार-तार होते ज्यादा वक्त नहीं लगता। अरे, ये भारत के प्रथम राष्ट्रपति भारत रत्न राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली है।
सिवान जिला मुख्यालय से पहले और आगे निकलकर जीरादेई पहुंचने की यात्रा में यह पहला साइनेज था। जन्मस्थली से महज चार किमी पहले बोर्ड पर लिखा था- जीरादेई, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली। सिवान जिला मुख्यालय कब पीछे छूटा पता ही नहीं चला। न वो शहर जैसा लगा, न जीरादेई गांव जैसा। बस दोनों का घालमेल, जैसे विकास इधर आने को कहकर कहीं और निकल गया। हिचकोले खाती गाड़ी थम चुकी थी, सामने बाबू का घर था।
राजेंद्र बाबू का घर। पुरखों का बनवाया। बाबू यहीं जन्मे थे। तारीख थी, तीन दिसंबर, 1884। इतने साल बीत गए, क्या-कुछ नहीं बदल गया, मगर जीरादेई के साठ पार के लोग अब भी नहीं बदले। वे डॉ. साहब को आज भी बाबू ही बोलते हैं। ये बाबू की सादगी का जादू ही तो है। पहली नजर में, जन्म स्थली स्मारक, राजेंद्र बाबू की इसी सादगी का प्रतिरूप नजर आता है। जीरादेई का हृदयस्थल। विराट। सौम्य। विशिष्ट। लेकिन, यह धारणा ज्यादा देर तक टिकी नहीं रहती। उनके पुराने घर की टूटी खपरैल की तरह, इस धारणा को तार-तार होते ज्यादा वक्त नहीं लगता।
अरे! ये भारत के प्रथम राष्ट्रपति भारत रत्न राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली है। संविधान सभा के अध्यक्ष। आजादी के बाद 1950 में मनोनीत और फिर 1952 से 1962 तक दो टर्म निर्वाचित राष्ट्रपति रहे, राजेंद्र बाबू की जन्मस्थली। 1962 में खुद उन्होंने अवकाश की घोषणा के साथ पद त्याग किया। जन्मस्थली ऐसे त्यागी की, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया। क्या ऐसे ही हैं, इनके समकालीन विभूतियों के जन्मस्थल स्मारक? जवाब साफ है, बिल्कुल नहीं।
ऐसा क्यों है? आखिर यह उपेक्षा क्यों? क्या सरकार इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचती? जनप्रतिनिधि भी इसके लिए क्यों कुछ नहीं करते? ये ऐसे सवाल हैं, जो जीरादेई पहुंचने वाले हर एक शख्स को झिंझोड़ते हैं। आहत करते हैं। आहत जीरीदेई के गांव वाले भी हैं। दो तरफा। पहला, सरकारों ने राजेंद्र बाबू की जन्मस्थली की कद्र नहीं की। दूसरा, संरक्षण के नाम पर स्मारक को पुरातत्व विभाग को सौंपकर गांव वालों की जिंदगी में कांटे बो दिए गए।