आनंद भवन, जो कभी देश की राजनीति का केंद्र था, जहां गांधी से लेकर तमाम शीर्ष नेताओं ने कुछ न कुछ दिन डेरा डाला, अगर उसे देखने -समझने की चाहत से खिंचकर लोग नहीं चले आ रहे हैं तो यह अपने आप में एक त्रासदी है। अभी कुछ वर्ष पहले तक इलाहाबाद के नाम से मशहूर और अब प्रयागराज हो चुके इस शहर में नेहरू को तलाशने निकलिए तो पहली नजर में निराशा ही हाथ लगती है। नेहरू की चर्चा छेड़ने पर सामान्यतया लोग हंस देते हैं। किस जमाने की बात कर रहे हैं जनाब!’
कहता तो कोई नहीं लेकिन, सामने वाले के चेहरे पर छपी इस इबारत को आसानी से पढ़ा जा सकता है। समय ने इतनी तेजी से करवट ली है कि जवाहर लाल नेहरू अपने ही शहर में अजनबी हो गए हैं। नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व की कोई भी छाप इस शहर में आसानी से ढूंढे नहीं मिलती। यहां तक कि नेहरू के जन्मस्थान के ध्वंसावशेष भी शेष नहीं हैं।
...एक जवाहर को खोजते हुए
पुराने शहर के लोकनाथ चौराहे पर खंडहर सरीखी एक इमारत से सटी दुकान पर मोटे-मोटे हर्फों में लिखा है-यहां कटे-फटे नोट बदले जाते हैं!’ इमारत ऐसी ही और तमाम दुकानों से घिरी है। किसी पर पान बिकता है तो किसी पर सब्जी। माहौल मछली बाजार सरीखा है। इमारत के बरामदे में किसी ने बेतरतीब-सी कपड़ों की दुकान लगा रखी है। ऊपर बड़ा सा बोर्ड लगा है, जिससे खबर मिलती है कि बरामदे से सटे कमरे में कभी कोई इत्र की बड़ी दुकान रही होगी। इस तीन तल्ला मकान की ऊपरी दो मंजिलों की हालत निचली मंजिल से भी गई बीती है। यह उस जवाहर लाल नेहरू की जन्मस्थली है, जिसे कभी कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने राजनीति के वसंत का राजकुमार कहा था।
दरअसल, इलाहाबाद में जब भी नेहरू के घर की बात होती है तो जिक्र आनंद भवन का ही आता है। नेहरू के जन्मस्थान का उल्लेख इतिहास की किताबों में भी कायदे से नहीं मिलता है। सच तो यह है कि नेहरू जिस घर में जन्मे, उसकी अब कोई निशानी बाकी नहीं है। शहर की सांस्कृतिक विरासत पर करीब से नजर रखने वाले अभय अवस्थी कहते हैं, मौजूदा लोकनाथ चौराहे पर कभी एक कारोबारी का बाग था। इसी में बने खपरैल के एक मकान में मोतीलाल नेहरू किराये पर रहते थे। 14 नवंबर 1889 को जवाहर लाल का जन्म इसी मकान के एक कमरे में हुआ था।’
पंडित जवाहरलाल नेहरू
- फोटो : Amar Ujala
आनंद भवन, जो कभी देश की राजनीति का केंद्र था, जहां गांधी से लेकर तमाम शीर्ष नेताओं ने कुछ न कुछ दिन डेरा डाला, अगर उसे देखने -समझने की चाहत से खिंचकर लोग नहीं चले आ रहे हैं तो यह अपने आप में एक त्रासदी है। अभी कुछ वर्ष पहले तक इलाहाबाद के नाम से मशहूर और अब प्रयागराज हो चुके इस शहर में नेहरू को तलाशने निकलिए तो पहली नजर में निराशा ही हाथ लगती है। नेहरू की चर्चा छेड़ने पर सामान्यतया लोग हंस देते हैं। किस जमाने की बात कर रहे हैं जनाब!’
कहता तो कोई नहीं लेकिन, सामने वाले के चेहरे पर छपी इस इबारत को आसानी से पढ़ा जा सकता है। समय ने इतनी तेजी से करवट ली है कि जवाहर लाल नेहरू अपने ही शहर में अजनबी हो गए हैं। नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व की कोई भी छाप इस शहर में आसानी से ढूंढे नहीं मिलती। यहां तक कि नेहरू के जन्मस्थान के ध्वंसावशेष भी शेष नहीं हैं।
...एक जवाहर को खोजते हुए
पुराने शहर के लोकनाथ चौराहे पर खंडहर सरीखी एक इमारत से सटी दुकान पर मोटे-मोटे हर्फों में लिखा है-यहां कटे-फटे नोट बदले जाते हैं!’ इमारत ऐसी ही और तमाम दुकानों से घिरी है। किसी पर पान बिकता है तो किसी पर सब्जी। माहौल मछली बाजार सरीखा है। इमारत के बरामदे में किसी ने बेतरतीब-सी कपड़ों की दुकान लगा रखी है। ऊपर बड़ा सा बोर्ड लगा है, जिससे खबर मिलती है कि बरामदे से सटे कमरे में कभी कोई इत्र की बड़ी दुकान रही होगी। इस तीन तल्ला मकान की ऊपरी दो मंजिलों की हालत निचली मंजिल से भी गई बीती है। यह उस जवाहर लाल नेहरू की जन्मस्थली है, जिसे कभी कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने राजनीति के वसंत का राजकुमार कहा था।
दरअसल, इलाहाबाद में जब भी नेहरू के घर की बात होती है तो जिक्र आनंद भवन का ही आता है। नेहरू के जन्मस्थान का उल्लेख इतिहास की किताबों में भी कायदे से नहीं मिलता है। सच तो यह है कि नेहरू जिस घर में जन्मे, उसकी अब कोई निशानी बाकी नहीं है। शहर की सांस्कृतिक विरासत पर करीब से नजर रखने वाले अभय अवस्थी कहते हैं, मौजूदा लोकनाथ चौराहे पर कभी एक कारोबारी का बाग था। इसी में बने खपरैल के एक मकान में मोतीलाल नेहरू किराये पर रहते थे। 14 नवंबर 1889 को जवाहर लाल का जन्म इसी मकान के एक कमरे में हुआ था।’
मोतीलाल नेहरू यहां छह वर्ष तक रहे
प्रयागराज चौक इलाके के लोकनाथ चौराहे का मकान। ऐसा कहा जाता है कि पं. जवाहर लाल नेहरू का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।
- फोटो : Amar Ujala
जवाहरलाल के जन्म के बाद मोतीलाल नेहरू यहां छह वर्ष तक रहे। 1895 में वह स्वराज भवन चले गए। जहां खपरैल का मकान था, आज वहीं लोकनाथ चौराहे पर खंडहर सरीखी इमारत खड़ी है। भले ही इस इमारत का नेहरू से कोई सीधा रिश्ता न जुड़ता हो, लेकिन स्थान के लिहाज से ऐतिहासिक होने के कारण वह आजादी की विरासत का अहम हिस्सा हो सकती थी। लेकिन, किसी ने इसे सहेजने का प्रयास नहीं किया। नेहरू के जन्मस्थान को लेकर एक और घर की चर्चा अक्सर होती है।
लोकनाथ चौराहे से कुछ ही दूर पर मीरगंज मोहल्ला है। अभी कुछ साल पहले तक इस मोहल्ले की कुछ गलियां रेडलाइट एरिया सरीखी हुआ करती थीं। नाच-गाने से लेकर जिस्मफरोशी तक, वह सब होता था, जिसे अंधेरी दुनिया का कारोबार कहा जाता है। कई जगह इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि नेहरू इन्हीं में से किसी गली के एक घर में जन्मे। बाकायदा एक मकान नंबर का उल्लेख करते हुए। इसे नेहरू का जन्मस्थान बताने के संदर्भ भी मिलते हैं। ‘यह सब नेहरू को बदनाम करने, उन्हें नीचा दिखाने की सियासी साजिश का हिस्सा है।’ कहते हैं अभय अवस्थी। अपनी बात के समर्थन में अभय तर्क देते हैं कि 1911 में इलाहाबाद इंप्रूवमेंट बोर्ड बना। उसके कई साल बाद नगर पालिका। उसके बाद मकानों को नंबर अलॉट हुए। नेहरू के जन्म के समय तो किसी घर का कोई नंबर होता ही नहीं था।’
आनंद भवन, जो नेहरू परिवार के घर के रूप में देशभर में विख्यात है, उसकी चमक भी हाल के सालों में तेजी से फीकी पड़ी है। यहां पर्यटकों की चहल-पहल नहीं दिखती। आनंद भवन को संचालित करने वाले ट्रस्ट के पदाधिकारियों का तर्क है कि कोरोना की वजह से पर्यटकों की संख्या घटी है। कुछ हद तक यह बात सही होते हुए भी पूरी तस्वीर सामने नहीं रखती। आनंद भवन आने वाले पर्यटकों में ज्यादातर वही होते हैं, जो संगम स्नान के लिए आते हैं। क्या कुछ पर्यटक ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ आनंद भवन देखने के लिए यहां आते हैं?
इस सवाल का सही जवाब देने को कोई तैयार नहीं होता। वह घर जो कभी देश की राजनीति का केंद्र हुआ करता था, जहां महात्मा गांधी से लेकर देश के तमाम शीर्ष नेताओं ने कुछ न कुछ दिन डेरा डाला, अगर उसे देखने-समझने की चाहत से खिंचकर लोग नहीं चले आ रहे हैं तो यह अपने आप में एक त्रासदी भी है और सियासी टिप्पणी भी। आनंद भवन आखिर संगम स्नान के पैकेज का हिस्सा क्यों नहीं होना चाहिए, वन प्लस वन की किसी स्कीम की तरह?
आनंद भवन से बमुश्किल फर्लांग भर दूर..
प्रयागराज के बालसन चौराहे पर नेहरू की प्रतिमा।
- फोटो : Amar Ujala
आनंद भवन से बमुश्किल फर्लांग भर दूर बालसन चौराहे पर कभी बीचोंबीच नेहरू की प्रतिमा अपनी पूरी गरिमा के साथ स्थापित हुआ करती थी। दो साल पहले कुंभ के दौरान शहर में तमाम बदलाव हुए। सड़कें चौड़ी की गईं। चौराहों को भव्यता प्रदान की गई। कई पुल बनाए गए। इस उठापटक में नेहरू की प्रतिमा बालसन चौराहे पर भी हाशिए की तरफ खिसका दी गई है। पहले हर आने-जाने वाले की नजर उस पर पड़ा करती थी।
मगर अब, आपको सड़क पार करके कुछ कदम चलना होगा तब कहीं जा कर नेहरू से मुलाकात हो पाएगी। जिस पार्क में नेहरू की प्रतिमा स्थापित है, उसके पास मिलते हैं एक जूता टांकने वाले सज्जन। नेहरू की सोहबत में रहते-रहते धूमिल के मोची राम की तरह इनकी सियासी समझ भी पैनी हो गई है। कभी कोई आता है नेहरू की प्रतिमा की खोज खबर लेने? पूछने पर जनाब तपाक से जवाब देते हैं- को आई? साल में दुई बार कुछ कांग्रेसी आवत हैं, फूलमाला चढ़ाए। बाकी कोई का का मतलब?’
गोविंद बल्लभ पंत संस्थान के निदेशक बद्री नारायण कहते हैं- आप नेहरू के विकास की अवधारणा देखिए। वे नया रचते हैं, किंतु पुराने के लिए भी स्पेस बचाए रखते हैं। लेकिन, आज जिस तरह का आक्रामक विकास हम कर रहे हैं, उसमें पुराने के लिए गुंजाइश कम बची है।’ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो. हर्ष कुमार कहते हैं, नेहरू ने आधुनिकता यूरोप से सीखी तो अपनी विरासत की समझ उन्हें इसी शहर से मिली। यही वजह है कि नेहरू की सोच में एक संतुलन है। अब ऐसा लगता है कि जैसे लोगों के बीच का धीरज चुक रहा है। शहर की उत्सवधर्मिता और बेफिक्री जैसे चुकती जा रही है।’
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि संगमनगरी ने नेहरू को पूरी तरह भुला ही दिया है। नगर निगम सभागार में नेहरू की बड़ी सी तस्वीर पूरी प्रतिष्ठा के साथ लगी है। नीचे नेम प्लेट पर लिखा है- पंडित जवाहर लाल नेहरू, एमए, बार एट लॉ। चतुर्थ अशासनिक सभापति, 3-4-1923 से 28-2-1925 तक। आज जिसे मेयर कहा जाता है वह पद नेहरू ने करीब दो वर्ष संभाला। नगर निगम का नेहरू के प्रति यह सम्मान प्रदर्शन, यह आदर भाव उस शिकवे को कुछ हद तक कम कर देता है, जो इस शहर में नेहरू की अनुपस्थिति से बार-बार सालता है।
पहली सियासी पाठशाला भी जर्जर
अवध किसान आंदोलन के अगुवा बाबा रामचंद्र।
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‘पंडित जवाहरलाल नेहरू, आपको सूचित किया जाता है कि आपकी इस जिले में उपस्थिति वांछित नहीं है। आपको निर्देशित किया जाता है कि आप अगली ट्रेन से जिला छोड़ दें।’ जवाब में नेहरू ने लिखा,‘मैं जानना चाहूंगा कि यह एक औपचारिक आदेश है या महज एक अनुरोध। अगर यह पहले वाला है तो इसे औपचारिक तरीके से धाराओं इत्यादि का उल्लेख करते हुए तैयार किया जाना चाहिए। जब तक ऐसा आदेश मुझे नहीं दिया जाता मैं यहीं रहूंगा।’
दिन था सात जनवरी 1921 और स्थान मुंशीगंज व रायबरेली के बीच का एक मैदान। उपरोक्त लिखित संवाद हुआ रायबरेली के तत्कालीन डीएम और कांग्रेसी जवाहर लाल नेहरू के बीच। इसके बाद जो हुआ वह अब इतिहास की किताबों में विस्तार से दर्ज है- कि उस दिन किसान किस कदर उत्तेजित थे, उन्हें संभालने में अंग्रेजों को गोलियां तक चलाने की नौबत आ गई थी।
यह अवध के किसान आंदोलन का दौर था। प्रतापगढ़ से शुरू हुआ यह आंदोलन आसपास के तमाम जिलों में फैल गया था। यह विलायत से लौटे नेहरू के राजनीति में शुरुआती दिन भी थे। किसान आंदोलन की बदौलत ही नेहरू ने जमीनी राजनीति की समझ की पूंजी हासिल की। विडंबना ही है कि प्रच्छन्न रूप से नेहरू के राजनीतिक गुरु साबित होने वाले किसान आंदोलन के प्रणेता बाबा रामचंद्र की कर्मस्थली आज भी पूरी तरह उपेक्षित है। इलाहाबाद के पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ के जिस रूरा नामक कस्बे को केंद्र बनाकर बाबा रामचंद्र ने किसान आंदोलन को विकसित किया और अंग्रेज सरकार की ईंट से ईंट बजा दी, वहां उनकी स्मृतियों को सहेजने का कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखता।
किसान आंदोलन स्मारक की आज हालत यह है कि यहां जगह-जगह गंदगी का ढेर लगा है। वह पुस्तकालय कभी बन ही नहीं सका, जिसमें आजादी के आंदोलन से जुड़ी तमाम किताबों को संग्रहित किया जाना था। स्मारक पर कागजाें में लाखों खर्च हो चुके हैं लेकिन हालत नहीं सुधरी। गांव के प्रधान उदय प्रताप सिंह कहते हैं- हर ओर भ्रष्टाचार का घुन लगा है। बाबा रामचंद्र के सहयोगी रहे झिंगुरी सिंह के प्रपौत्र दिनेश सिंह कहते हैं- जब कोई सरकारी कार्यक्रम होता है तो रंग चुनकर ऊपर से सब दुरुस्त कर दिया जाता है, लेकिन उसके बाद रात गई बात गई। कौन बाबा रामचंद्र? कौन झिंगुरी सिंह? किसको फिकर पड़ी है?’
महामना मालवीय और राजर्षि टंडन भी गुम
मालवीय नगर मोहल्ले के इसी मकान में पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ था।
- फोटो : Amar Ujala
यह संयोग ही है कि प्रयागराज के जिस मोहल्ले में जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ, वहीं दो और भारत रत्न, मदन मोहन मालवीय और पुरुषोत्तम दास टंडन भी जन्मे। लेकिन, जन्मस्थान के संरक्षण के मामले में इन विभूतियों की स्थिति भी भिन्न नहीं है। लोकनाथ चौराहे से आगे करीब एक किलोमीटर दूर गलियों से गुजरते चले जाइए तो एक मकान पर लगी पट्टिका से पता चलता है कि यह मदनमोहन मालवीय की जन्मस्थली है।
अहियापुर, जिसे अब मालवीय नगर कहा जाने लगा है, के मकान नंबर 458 तक पहुंचने के लिए कायदे की सड़क तक नहीं है। पुरुषोत्तम दास टंडन के घर की हालत भी इससे बेहतर नहीं है। वहां तक पहुंचने की गलियां तो और संकरी हैं। जिस घर में वह जन्मे, उसके आज कई हिस्से हो चुके हैं। पुरुषोत्तम दास टंडन के पौत्र डॉ. प्रमोद टंडन कहते हैं-जिस व्यक्ति को भारत रत्न के लायक समझा गया हो, उसके जन्मस्थान को स्मारक बनाने के लिए क्या किसी मेमोरेंडम की जरूरत है।
मदन मोहन मालवीय की 100वीं जयंती आई, फिर 150वीं जयंती आई, फिर उन्हें भारत रत्न मिला। हर बार यही कहा गया कि अब इस इलाके को नई पहचान दे ही दी जाएगी लेकिन वादे, वादे ही रह गए। घोषणाएं अब भी अमल के इंतजार में हैं।