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PM: तीन की जगह ग्यारह से कितनी सधी सियासत, चुनावों में काम करेगा मोदी के लिए गोविंद गिरी का यह 'रहस्योद्घाटन'?

सार

गोविंद देव गिरी ने कहा कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन दिनों का पालन करने के लिए कहा। लेकिन मोदी जी ने कड़ी संकल्प साधना कर ग्यारह दिनों तक नियमों का कड़ाई से पालन किया। "तीन की जगह ग्यारह" दिनों की इस तपस्या को सियासी गलियारों में भी अलग-अलग नजरिए से आंका जा रहा है।  
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PM Modi - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अयोध्या में राम मंदिर के शुभारंभ में आने से पहले तीन दिनों के लिए कड़े व्रत और नियमों का पालन करना था लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन दिन की बजाए ग्यारह दिनों तक कड़े नियमों का पालन किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्यारह दिनों तक विदेश की किसी भी यात्रा से दूरी बनाए रखी। श्री राम जन्मभूमि में तीर्थ न्यास क्षेत्र के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर शुभारंभ में आने से पहले नियमों को जानने के लिए पूछा था।

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गोविंद देव गिरी ने कहा कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन दिनों का पालन करने के लिए कहा। लेकिन मोदी जी ने कड़ी संकल्प साधना कर ग्यारह दिनों तक नियमों का कड़ाई से पालन किया। "तीन की जगह ग्यारह" दिनों की इस तपस्या को सियासी गलियारों में भी अलग-अलग नजरिए से आंका जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तपस्या को लेकर खूब चर्चा हो रही है।

सियासी जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "तीन की जगह ग्यारह दिन" की कड़ी तपस्या का सियासी आंकलन किया जा रहा है। राजनीतिक जानकार प्रोफेसर रामऔतार कर्मा कहते हैं कि देश में इस वक्त राम मंदिर के शुभारंभ को लेकर जो माहौल बना है उसमें प्रधानमंत्री के ग्यारह दिनों का कड़ाई से पालन करना चर्चा का विषय बना ही हुआ है। वह कहते हैं कि वैसे तो ज्यादातर लोगों को इस बात का पता ही था कि प्रधानमंत्री ग्यारह दिनों के उपवास पर हैं लेकिन वह जमीन पर सो रहे हैं, उन्होंने विदेश की यात्राएं रद्द कर दीं और जिन नियमों का पालन उन्होंने ग्यारह दिनों तक किया उसके लिए उनको तीन दिनों का ही निर्देश मिला था। कर्मा कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस तरह की किसी भी कार्यपद्धति का लाभ उनकी पार्टी को मिलता ही है।
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प्रोफेसर कर्मा का कहना है कि राम जन्मभूमि में तीर्थ न्यास क्षेत्र के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने प्रधानमंत्री के तीन दिनों तक लिए जाने वाले कड़े संकल्प की बजाय ग्यारह दिनों तक उनका पालन करने की बात सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही है। ऐसे में मोदी की राम मंदिर शुभारंभ के लिए की गई संकल्प साधना को न सिर्फ उनकी पार्टी बल्कि उनके समर्थकों की आस्था से जोड़ रहे हैं, बल्कि एक विशेष तबके में यह सियासी तौर पर भी आगे बढ़ रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र के एडिशनल प्रोफेसर हिमांशु त्यागी कहते हैं कि जब किसी भी महत्वपूर्ण आयोजन में प्रमुख व्यक्ति के सकारात्मक पहलू को सामने लाया जाता है तो उसके हर तरह के फायदे भी होते हैं। चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक राजनीतिक व्यक्ति हैं, इसलिए यह माना जा रहा है कि उनके संकल्प साधना का सियासी फायदा भी मिलेगा।

राजनीतिक विश्लेषक ओपी तंवर कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी भले राम मंदिर को आस्था से जोड़कर देखने की बात करती हो लेकिन इसका सियासी फायदा उसको मिल ही रहा है। राम मंदिर के शुभारंभ पर राम विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कड़ी संकल्प साधना भी इसी नजरिए से देखी जा रही है। वह कहते हैं कि लोगों में यह संदेश लगातार जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के लिए कितने कड़े नियम का पालन किया। तंवर कहते हैं भले ही व्यापक रूप से यह  वोट में तब्दीली का कारण न बने लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के नैरेटिव अक्सर वोट के रूप में तब्दील होते हैं। खासतौर से उन इलाकों में जहां पर इस वक्त भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं वहां पर तो इसके सियासी फायदे का अनुमान लगाया ही जा सकता है।

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