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विधानसभा चुनाव 2022: पांचों चुनावी राज्यों पर 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज, लाइलाज न बन जाए 'मुफ्त' की बीमारी

सार

आर्थिक मामलों के जानकार और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि कोरोना जैसी आपदा के समय जनता के हित के लिए विशेष योजनाएं चलाना, उन्हें भोजन-स्वास्थ्य की सहायता देना सभी सरकारों का कर्तव्य है। इस समय में यदि बजट घाटा बढ़ता है तो इसे सही कहा जाना चाहिए...
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उत्तर प्रदेश चुनाव: संकल्प पत्र 2022 जारी करते भाजपा पदाधिकारी - फोटो : Agency
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विस्तार
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देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। सभी राजनीतिक दल लोगों का वोट पाने के लिए बढ़-चढ़कर चुनावी घोषणाएं कर रहे हैं। मुफ्त लैपटॉप, स्कूटी, मुफ्त बिजली, भत्ता-पेंशन, कर्जा माफ करने की होड़ लगी हुई है। ये घोषणाएं तब की जा रही हैं जब ये सभी चुनावी राज्य आकंठ कर्ज में डूबे हुए हैं। इन पांच राज्यों पर 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज हो चुका है। यूपी पर 6.53 लाख करोड़ रुपये और पंजाब पर 2.82 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है। देश के सभी राज्यों को मिलाकर यह कर्ज 70 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। देश के कई राज्य कर्ज लेने की क्षमता भी खोने के करीब पहुंच चुके हैं। इसके बाद भी मुफ्त घोषणाएं करने की बीमारी बढ़ती जा रही है।

कर्ज में डूबा उत्तर प्रदेश

वर्ष 2017 में, जिस समय भाजपा नेता योगी आदित्याथ ने यूपी की सत्ता संभाली, प्रदेश पर कुल 4,73,348.2 करोड़ रुपये का कर्ज था। 2018 में यह कर्ज बढ़कर 5.17 लाख करोड़, 2019 में 5.67 लाख करोड़ और 2020 में 5.49 लाख करोड़ रुपये हो गया। 2021 के संशोधित पूर्वानुमान में यूपी पर कुल कर्ज 6.0 लाख करोड़ रुपये की सीमा को पार कर गया। 2022 के बजट पूर्वानुमान में इसके छह लाख 53 हजार 307.5 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया है।  

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2007 में यूपी की सत्ता बसपा नेता मायावती ने संभाली थी। उन्हें विरासत के रूप में यूपी पर 1.67 लाख करोड़ रुपये का कर्ज मिला था। इसके बाद 2008 में यह कर्ज बढ़कर 1.79 लाख करोड़, 2009 में 1.92 लाख करोड़, 2010 में 2.06 लाख करोड़ रुपये, 2011 में 2.29 लाख करोड़ रुपये हो गया।

वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने यूपी की कमान संभाली। उन्हें मायावती सरकार से विरासत के रूप में 2.44 लाख करोड़ रुपये का कर्ज मिला। 2014 में यूपी पर कर्ज बढ़कर 2.66 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह कर्ज 2015 में तीन लाख करोड़ रुपये की मनोवैज्ञानिक सीमा पार करते हुए 3.14 लाख करोड़ रुपये हो गया। 2016 में यूपी पर कुल कर्ज 3.85 लाख करोड़ रुपये और 2017 में 4.73 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

समृद्ध पंजाब भी कर्ज में डूबा

कांग्रेस की जीत के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2017 में पंजाब की सत्ता संभाली थी। 2017 में पंजाब पर कुल 1.82 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। 2018 में यह कर्ज 1.95 लाख करोड़ रुपये, 2019 में 2.11 लाख करोड़ रुपये, 2020 में 2.29 लाख करोड़ रुपये हो गया। 2021 के संशोधित पूर्वानुमान में यह कर्ज 2.59 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। 2022 के बजट में इसके दो लाख 82 हजार 864.6 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।

उत्तराखंड पर कुल कितना कर्ज

2017 में उत्तराखंड पर कुल कर्ज 44.50 हजार करोड़ रुपये था। इसके बाद साल दर साल यह बढ़ता रहा। 2018 में यह कर्ज 53.07 हजार करोड़, 2019 में 59.38 हजार करोड़ रुपये, 2020 में 67.54 हजार करोड़, 2021 में 75.35 हजार करोड़ हो गया। 2022 के बजट में यह घाटा बढ़कर 84.288 हजार करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है।

गोवा और मणिपुर पर भी भारी कर्ज

गोवा छोटा राज्य है। यह पर्यटन की दृष्टि से काफी समृद्ध भी है, लेकिन इसके बाद भी यह कर्ज में डूबा हुआ है। 2017 में नई सरकार आने पर इस पर 16,903 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब 2022 में बढ़कर 28,509 करोड़ होने का अनुमान है। इसी प्रकार चुनावी राज्य मणिपुर पर 2017 में 8831.4 करोड़ रुपये का कर्ज था जो अब बढ़कर 13510.6 करोड़ होने का अनुमान है।

10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज

इस प्रकार पांच चुनावी राज्यों का सम्मिलित कर्ज 10.60 लाख करोड़ की सीमा पार कर चुका है। देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिला दें तो यह कर्ज 69.47 लाख करोड़ से पार जा चुका है। ताजा आंकड़े आने पर यह आंकड़ा बढ़ सकता है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

आर्थिक मामलों के जानकार और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि कोरोना जैसी आपदा के समय जनता के हित के लिए विशेष योजनाएं चलाना, उन्हें भोजन-स्वास्थ्य की सहायता देना सभी सरकारों का कर्तव्य है। इस समय में यदि बजट घाटा बढ़ता है तो इसे सही कहा जाना चाहिए। लेकिन सामान्य काल में केवल वोट हासिल करने के लिए कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर पैसा लुटाना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता।

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गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि यदि सरकारें मूलभूत ढांचे के विकास में निवेश करती हैं, इसके लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है और इस कारण बजट घाटा बढ़ता है। जैसे केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश में पांच अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट तैयार कर रही है, केंद्र-राज्य सरकारें प्रदेश में कई एक्सप्रेस-वे-हाइवे, नोएडा फिल्म सिटी और 59 मेडिकल कॉलेज बनाने में भारी निवेश कर रही हैं। इसके कारण उसे कर्ज भी लेना पड़ रहा है तो इस तरह के कर्ज को सही कहना चाहिए क्योंकि इस तरह निवेश किया गया पैसा रोजगार और व्यापार के बड़े अवसर पैदा करता है। इस तरह के निवेश से लंबे समय में राज्यों की आय बढ़ती है।

क्या है आदर्श स्थिति

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समय-समय पर राज्यों के लिए दिशा-निर्देश जारी करता रहता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिय की सलाह के अनुसार किसी राज्य का घाटा इसके सकल घरेलू उत्पाद का चार फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यह कोई निर्धारित अधिकतम सीमा नहीं है, बल्कि यह एक सलाह है जिसे राज्यों से मानने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन यह बाध्यकारी नहीं है। हालांकि, कोरोना काल को ध्यान में रखते हुए इसके कुछ अधिक हो जाने को स्वीकार किया जा रहा है।  

केंद्र सरकार का बजटीय घाटा भी बढ़कर 6.9 फीसदी तक पहुंच चुका है, जिसे बहुत ज्यादा माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि इस वित्त वर्ष में इसे 6.4 फीसदी पर लाया जाएगा। बजटीय घाटा बहुत ज्यादा बढ़ जाने से किसी देश की आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर साख खराब होती है। उसके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्ज पाने में भी मुश्किलें आती हैं। पाकिस्तान इस समय इसी तरह के आर्थिक संकट का सामना कर रहा है।

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