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क्या है असम का जमीन विवाद: समुदाय विशेष के लोग हटाए जा रहे या सरकारी जमीन खाली कराई जा रही?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 27 Sep 2021 08:35 PM IST

सार

सिपाझार में 1200 से 1300 परिवारों पर आरोप है कि उन्होंने अवैध तरीके से 10 हजार बीघा से ज्यादा की सरकारी जमीन पर बस्ती बसा ली थी। इन्हें हटाने के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई। 
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असम के सिपाझार में हाल ही में जमीन खाली कराने पहुंची पुलिस की वहां लोगों से झड़प हो गई थी। इस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति को पुलिस की गोली लगते देखा गया था। - फोटो : वीडियो स्क्रीनग्रैब/Twitter
असम के दारंग जिले के सिपाझार गांव में पिछले हफ्ते जमीन खाली कराने के अभियान के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें दो लोगों की मौत हुई, जबकि कई और लोग घायल भी हुए। घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें लाठी लिए एक प्रदर्शनकारी को पुलिस की गोली से जान गंवाते भी देखा जा सकता है। इसी वीडियो में एक व्यक्ति द्वारा मृतक के शव को कुचलते भी देखा गया था। इसके बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश दे दिए। 

इस मामले पर दो दिन पहले ही पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिक को बुलाया था। पाक विदेश मंत्रालय का आरोप था कि राज्य में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर पाकिस्तान की मौकापरस्ती की बात साफ है। लेकिन असम में यह कोई पहली बार नहीं था, जब जमीन विवाद को लेकर विवाद पैदा हुआ है। राज्य में पहले भी कब्जाई गईं सरकारी जमीन खाली कराने के दौरान जबरदस्त झड़प हो चुकी हैं।
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असम के सिपाझार में हाल ही में जमीन खाली कराने पहुंची पुलिस की वहां लोगों से झड़प हो गई थी। इस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति को पुलिस की गोली लगते देखा गया था। - फोटो : वीडियो स्क्रीनग्रैब/Twitter
असम के दारंग जिले के सिपाझार गांव में पिछले हफ्ते जमीन खाली कराने के अभियान के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें दो लोगों की मौत हुई, जबकि कई और लोग घायल भी हुए। घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें लाठी लिए एक प्रदर्शनकारी को पुलिस की गोली से जान गंवाते भी देखा जा सकता है। इसी वीडियो में एक व्यक्ति द्वारा मृतक के शव को कुचलते भी देखा गया था। इसके बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश दे दिए। 

इस मामले पर दो दिन पहले ही पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिक को बुलाया था। पाक विदेश मंत्रालय का आरोप था कि राज्य में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर पाकिस्तान की मौकापरस्ती की बात साफ है। लेकिन असम में यह कोई पहली बार नहीं था, जब जमीन विवाद को लेकर विवाद पैदा हुआ है। राज्य में पहले भी कब्जाई गईं सरकारी जमीन खाली कराने के दौरान जबरदस्त झड़प हो चुकी हैं।

क्यों हुआ विवाद?

दरअसल, सिपाझार में बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले मुस्लिम रहते हैं। वे जिन इलाकों में रहते हैं, आरोप है कि वहां अवैध तरीके से सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया है। इसी साल जून में जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने क्षेत्र का दौरा किया था, तो उन्होंने स्थानीय समुदायों से वादा किया था कि वह उनकी कब्जाई गई जमीनों को वापस दिलाएंगे और यहां धौलपुर गांव में मौजूद शिव मंदिर में बाउंड्री वॉल का निर्माण होगा।

उधर, सरकार का कहना है कि इन कब्जों से जमीन खाली कराने का अभियान इसलिए है ताकि असम के बिना जमीन वाले स्थानीय समुदायों को कृषि योग्य जमीन मुहैया हो सके। इसके लिए राज्य सरकार ने बजट में 9.6 करोड़ रुपये कृषि परियोजना के लिए अलग से तय किए हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत खाली कराई गई सरकारी जमीन पर पौधे लगाए जाएंगे और यहां कृषि गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसमें स्थानीय युवा शामिल होंगे। कृषि विभाग के अनुरोध के तहत ही जिला प्रशासन ने कब्जाई जमीन को सामुदायिक कृषि भूमि घोषित कर दिया। 

सिपाझार में कितना बड़ा अभियान?

जून में अवैध कब्जाइयों को हटाने के लिए प्रशासन ने शिव मंदिर के पास अभियान चलाया। सात परिवारों को हटाया भी गया। इसके बाद बीते सोमवार से गुरुवार तक भी बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। बता दें कि सिपाझार में 1200 से 1300 परिवारों पर आरोप है कि उन्होंने अवैध तरीके से 10 हजार बीघा से ज्यादा की सरकारी जमीन पर बस्ती बसा ली थी। इन्हें हटाने के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई। 

किन लोगों से खाली कराई जा रही जमीन?

दावा किया जा रहा है कि असम में इस वक्त जिन लोगों को अवैध कब्जे वाली जमीन से हटाया जा रहा है, उनमें बड़ी संख्या बंगाली बोलने वाले मुस्लिमों की है। ये लोग ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर हैं। सरकार का कहना है कि इन लोगों ने जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया था, लेकिन यहां रहने वाले लोगों का दावा है कि वो बाड़पेटा और गोलपारा जैसे जिलों में नदी के कटान की वजह से अपना घर खोने के बाद यहां आ गए थे। इन लोगों का कहना है कि वे पिछले 40 सालों से यहां रह रहे हैं। कुछ लोगों का तो यहां तक दावा है कि उन्होंने स्थानीयों से जमीन खरीदी थी, लेकिन ज्यादातर लेन-देन बिना किसी दस्तावेजी कार्रवाई के हुए, इसलिए उनकी वैधता पर सवाल उठ गए।

स्थानीय लोगों का क्या कहना है?

धौलपुर की जमीन के कुछ हिस्सों और बड़े गरुखुटी इलाके भी पिछले कई दशकों में जमीन विवाद का केंद्र रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रवासियों ने उनकी जमीन कब्जा ली। इन्हीं विवादों के बीच कई बार अवैध कब्जाइयों को पहचानकर उन्हें जमीन से हटाने की भी बात चली। कुछ संगठन भी स्थानीय समुदाय के समर्थन में आवाज उठाते हुए घेरी हुई जमीन को छुड़ाने की मांग रख चुके हैं। 

इस कड़ी में एक अहम मोड़ 2015 में आया, जब दूध उत्पादकों के संगठन दक्षिण मंगलदई ग्वाला संथ के अध्यक्ष कोबद अली के नेतृत्व में कुछ लोगों ने असम भूमि अतिक्रमण (रोकथाम) कानून, 2010 तहत केस दायर कर दिया। इसमें मंगलदोई की अदालत से मांग की गई थी कि वह सिपाझार में गांवों से अवैध कब्जाइयों को निकालने के लिए दखल दे। इससे पहले 2013 की एक आरटीआई में सामने आया था कि इस इलाके में 77 हजार बीघा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे बरकरार हैं। भाजपा ने तब अपने चुनावी अभियान में इस जमीन को खाली कराने का भी वादा किया था।

सरकार के अभियान के खिलाफ कोर्ट गए लोग

बताया गया है कि अब तक धौलपुर में जिन लोगों से जमीन खाली कराई गई है, उनमें से कुछ ने पिछले महीने ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जवाब में असम सरकार ने भी हलफनामा दाखिल कर कहा था कि कब्जे सरकारी जमीन पर स्थित हैं, इसलिए उन्हें हटाया जाना जरूरी है। इससे पहले कि याचिकाकर्ता कुछ जवाब दे पाते, सरकार ने जमीन को खाली कराने के लिए अभियान शुरू करा दिया।

हिंसक कैसे हो गया निकासी कार्यक्रम?

पिछले सोमवार को जब धौलपुर गांव से 800 परिवारों को हटाया गया, तब यह अभियान ज्यादातर शांत ही रहा। लेकिन गुरुवार को ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन जैसे कुछ संगठनों ने यहां रहने वाले लोगों के साथ जबरदस्त प्रदर्शन किए और दूसरी जगह बसाए जाने की मांग की। बताया गया है कि अधिकारियों ने इसके बाद निकाले जाने वालों के साथ बैठक की और समझौते का आश्वासन दिया। 

इस बीच, निकाले गए लोगों का आरोप है कि अधिकारियों ने कथित तौर पर निष्कासन कार्यक्रम सिर्फ तब तक रोकने की बात कही, जब तक उनके रहने का दूसरा इंतजाम नहीं हो जाता। इसी के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए और हिंसा भड़क उठी। दूसरी तरफ अफसरों का कहना है कि समझौते के बावजूद स्थानीय लोगों ने पुलिस को अचानक ही लाठी, डंडों और पत्थरों से पीटना शुरू कर दिया। दर्रांग के एसपी सुशांत बिस्व सरमा ने कहा कि इस हिंसा के बीच पुलिस ने खुद को बचाने की कोशिश में कार्रवाई की।
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