जब भी जम्मू-कश्मीर का जिक्र आता है तो उसके साथ ही अनुच्छेद 370 की चर्चा भी शुरू हो जाती है। इसकी वजह से हमेशा देश की राजनीति में उबाल आता रहा है। दरअसल यह भारतीय संविधान का एक ऐसा नियम है, जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देता है। आजादी के समय जम्मू-कश्मीर रियासत के भारतीय गणराज्य में विलय के समय महाराजा हरि सिंह ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन नाम के दस्तावेज पर दस्तखत किया था। अनुच्छेद 370 इसी के अंतर्गत आता है।
भारत को आजादी मिलने के बाद 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान समर्थित ‘आजाद कश्मीर सेना’ ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर कश्मीर पर आक्रमण करके काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया था। इस हिस्से को आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) कहा जाता है।
दिसंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई में कहा था कि इसे संविधान से हटाने का फ़ैसला सिर्फ संसद कर सकती है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एचएल दत्तू की बेंच ने उस वक्त कहा था, ''क्या ये कोर्ट का काम है? क्या संसद से कह सकते हैं कि ये आर्टिकल हटाने या रखने पर वो फैसला करें, ये करना इस कोर्ट का काम नहीं है।''
साल 2015 में ही जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा था कि संविधान के भाग 21 में ''अस्थायी प्रावधान'' शीर्षक होने के बावजूद अनुच्छेद 370 एक स्थायी प्रावधान है। अदालत ने कहा था कि अनुच्छेद 370 के खंड तीन के तहत ना तो इसे निरस्त किया जा सकता है और ना ही इसे संशोधित किया जा सकता है।
राज्य का कानून 35ए को संरक्षण देता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर बाकी राज्यों की तरह भारत में शामिल नहीं हुआ, इसने भारत के साथ संधिपत्र पर हस्ताक्षर करते वक्त अपनी संप्रभुता कुछ हद तक बकरार रखी थी।
1947 में विभाजन के समय जब जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई तब जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। इसी दौरान तभी पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने वहां आक्रमण कर दिया जिसके बाद बाद उन्होंने भारत में विलय के लिए सहमति दी।