आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के आदेशों का पालन न करने पर अवमानना की स्थिति से बचने के लिए रक्षा मंत्रालय ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आज उस मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने इस पर कोई भी स्टे ऑर्डर देने से इनकार दिया। वहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में रक्षा मंत्रालय से फाइल नोटिंग दाखिल करने के लिए कहा है। एएफटी को अवमानना (कंटेम्प्ट) शक्तियां देने के फैसले के खिलाफ सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी। एएफटी ने 31 जुलाई को फैसला सुनाया था कि उसके आदेशों का जानबूझकर पालन न करने की स्थिति में एएफटी के पास अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए वह अफसरों के खिलाफ अवमानना का मामला चला सकता है।
स्थगन आदेश देने से किया इनकार
दिल्ली हाईकोर्ट में यह मामला बुधवार को सूचिबद्ध हुआ था। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) को अवमानना के मामलों में शक्तियां देने के खिलाफ केंद्र सरकार दिल्ली हाई कोर्ट पहुंची थी। दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस रेखा पल्ली और जस्टिस सलिंदर कौर ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कोई भी स्थगन आदेश देने से इनकार कर दिया। साथ ही, दिल्ली हाई कोर्ट ने फाइल नोटिंग दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अफसर ने इस अपील को दाखिल करने की अनुमति दी थी। साथ ही, अदालत ने यह भी पूछा है कि यह अपील क्यों दायर की गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय को एफिडेविट पर फाइल नोटिंग दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 03 अक्तूबर को करेगी। बता दें कि फाइल नोटिंग का मतलब है कि इस अपील को दायर करने के लिए किस अधिकारी ने मंजूरी दी थी।
सैन्य कर्मियों की शिकायतों का नहीं हो रहा समाधान
इस मामले से जुड़े वकील कर्नल मुकुल देव ने बताया कि आज सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट का रुख बेहद सख्त था। अदालत ने यह भी बोला कि एक तरफ तो सरकार आर्म्ड फोर्सेस के सशक्त करने की बात करती है, तो दूसरी तरफ एएफटी को अवमानना का अधिकार मिलने के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट पिटिशन लगाती है। उन्होंने बताया कि एएफटी एक्ट में एएफटी को अवमानना शक्तियां प्रदान नहीं की गई थीं, जिसके चलते सशस्त्र बल के कर्मचारी एएफटी के फैसलों को लागू करवाने के लिए इधर-उधर भटक रहे थे। अब, 10 सालों की कड़ी लड़ाई के बाद, जब आखिरकार 31 जुलाई 24 को पारित फैसले के जरिए अवमानना शक्तियां प्रदान की गईं, तो सरकार ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ रिट याचिका दायर की। उन्होंने बताया कि अकेले दिल्ली के ही लगभग 5813 मामले रक्षा मंत्रालय के समक्ष क्रियान्वयन के लिए लंबित हैं। उनका कहना है कि सशस्त्र बल के कर्मचारियों को मौजूदा सरकार तीसरे दर्जे का नागरिक मानती है, जहां वे भारत के किसी भी अन्य नागरिक की तरह अपनी शिकायतों का समाधान भी नहीं करवा सकते हैं।
एएफटी के फैसलों की अनदेखी कर रहा है रक्षा मंत्रालय
31 जुलाई को दिए अपने आदेश में न्यायाधिकरण ने माना था कि न्यायाधिकरणों के निर्देशों का लगातार पालन न करना सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम, 2007 की धारा-19 के दायरे में आता है और अधीनस्थ पीठों को हलफनामे के साथ संबंधित अवमानना आवेदनों की योग्यता निर्धारित करने का निर्देश दिया था। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने फैसला सुनाया था कि जानबूझकर आदेशों का पालन न करने की स्थिति में एएफटी अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए वह अफसरों के खिलाफ अवमानना का मामला चला सकता है। एएफटी में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उसके फैसलों की रक्षा मंत्रालय की तरफ से नियमित रूप से अनदेखी की जाती रही है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट भी लगा चुके हैं फटकार
एएफटी की बड़ी बेंच ने 500 पेजों के फैसले में, एएफटी एक्ट अधिनियम की धारा 29 और एएफटी एक्ट के नियम 25 की व्याख्या करते हुए कहा कि कानून निर्माताओं का एएफटी को शक्तिहीन बनाए रखने का कोई इरादा नहीं था। बेंच ने पाया कि एएफटी के 5,000 से अधिक आदेशों पर अफसरों की तरफ से कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा है, जबकि उन पर किसी भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई भी स्टे ऑर्डर नहीं दिया गया है। इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट भी रक्षा मंत्रालय को एएफटी के आदेशों का पालन न करने को लेकर कड़ी फटकार भी लगा चुका है। वहीं सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाई कोर्ट भी कई मामलों में विकलांग कर्मियों और अन्य पेंशनभोगियों के खिलाफ बेबुनियाद अपील दायर करने को लेकर रक्षा मंत्रालय के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां कर चुकी हैं। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय की इस सोच की आलोचना सरकार के उसके अपने पैनल और समितियां भी कर चुकी हैं।
फैला रखा है 'मुकदमे बाजी का आतंक'
ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और सेना के रिटायर्ड अफसर और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता भीम सेन सहगल ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि रक्षा मंत्रालय (वित्त) और जज एडवोकेट जनरल विभाग के अफसर न केवल देश की सभी अदालतों में विकलांग सैनिकों, वृद्ध पेंशनभोगियों और विधवाओं पर 'मुकदमे बाजी का आतंक' फैला रहे हैं, बल्कि सरकार को भी शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिसके चलते देश के विभिन्न दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बुजुर्ग पेंशनधारियों और विकलांग सैनिकों और विधवाओं को वकीलों और अदालतों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
फैसला आने के बाद भी नहीं मिल रहा पैसा
भीम सेन सहगल के मुताबिक आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार है कि रक्षा कर्मियों, पेंशनभोगियों और विधवाओं के पक्ष में आए लगभग सभी अदालती और ट्रिब्यूनल्स के आदेशों को रक्षा मंत्रालय अधिकारी देश भर की हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) में तकरीबन 748 अवमानना याचिकाएं पेंडिंग हैं, जिनमें रक्षा मंत्रालय को तीन महीने में ब्याज सहित पैसा लौटाने के लिए कहा गया है। लेकिन पैसा नहीं दिया जा रहा है। जबकि डिसेबिलिटी पेंशन के 1800 से ज्यादा मामले रक्षा मंत्रालय के पास पेंडिंग हैं। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्रालय के अधिकारी हर केस में ऊपरी अदालतों में अपील कर रहे हैं और फौजियों की अनदेखी कर रहे हैं। 2016-17 के केसों में अभी तक पेमेंट नहीं हुई है, इनमें विकलांग जवानों, बुजुर्ग पेंशनभोगियों और शहीद सैनिकों की विधवाओं के पेंशन के मामले हैं। ये ऐसे मामले हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी उनके हक में फैसला दे चुका है, लेकिन अभी तक पैसा नहीं दिया गया है।
न्याय पाना हुआ असंभव
सहगल कहते हैं कि आज की तारीख में, सीमाओं पर दुश्मन और आतंकवादियों से लड़ने के बजाय, हमारे अधिकारी देश की अदालतों में अपने ही पुराने पेंशनभोगियों और दिग्गजों के खिलाफ लड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, अटॉर्नी जनरल को भी सर्वोच्च न्यायालय में सबसे निचले रैंक के विकलांग कर्मियों के खिलाफ नियमित रूप से पेश होने के लिए कहा जा रहा है। एक देश के रूप में हम सभी के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है? उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने सशस्त्र सेना न्यायाधिकरणों (एएफटी) के न्यायिक सदस्यों के पदों को भी नहीं भरा है, बल्कि प्रशासनिक सदस्यों के पदों पर अपने फेवरेट अफसरों को बिठा दिया है। जिससे हमारे सैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों और विधवाओं के लिए न्याय पाना असंभव होता जा रहा है।
पूर्व मंत्रियों ने उठाए कड़े कदम
सहगल कहते हैं कि यूपीए कार्यकाल के आखिर में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सबसे पहले इस दर्द को महसूस किया और रक्षा मंत्रालय की तरफ से इन अनैतिक मुकदमों के बारे में जानकारी मिलने पर उन्होंने कई कदम उठाए। लेकिन जब भाजपा सत्ता में आई, तो प्रधानमंत्री मोदी के हस्तक्षेप पर पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कई कड़े कदम उठाए और इस मुकदमेबाजी को समाप्त किया और रक्षा मंत्रालय के अफसरों की तरफ की जाने वाली बेवजह की अपीलों पर रोक लगाई। पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के कार्यकाल में 2019 में भी ऐसी सभी अपीलें वापस ले ली गईं थीं और जब सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय के खिलाफ सख्त टिप्पणी की, तो उन्होंने अपने अफसरों को ऐसे मामले दायर करने के लिए फटकार लगाई। यहां तक कि रक्षा मंत्रालय और कानून मंत्रालय द्वारा गठित समितियों ने भी अफसरों को सैनिकों और विधवाओं के खिलाफ फालतू की मुकदमे बाजी में शामिल होने के लिए भी फटकार लगाई थी।