जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश की 'सभी तरह' से पुष्टि की। हालांकि, शीर्ष कोर्ट ने सुनवाई लंबित रहने तक गोगोई को जमानत दे दी और कहा कि वह करीब 567 दिनों से जेल में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों और माओवादियों से संदिग्ध संबंधों से जुड़े एक मामले में असम के निर्दलीय विधायक अखिल गोगोई को मंगलवार को जमानत दे दी। न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यन और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने हालांकि गौहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसने मामले में गोगोई की आरोपमुक्ति को रद्द कर दिया था।
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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने गोगोई सहित सभी चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के सवाल पर नए सिरे से सुनवाई करने के लिए मामले को वापस निचली अदालत के पास भेज दिया था।
जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश की 'सभी तरह' से पुष्टि की। हालांकि, शीर्ष कोर्ट ने सुनवाई लंबित रहने तक गोगोई को जमानत दे दी और कहा कि वह करीब 567 दिनों से जेल में हैं। अदालत ने कहा, वह पिछले 21 महीने से अधिक समय से आजाद व्यक्ति के रूप में बाहर हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि उनकी स्वतंत्रता जमानत के आदेश से नहीं, बल्कि विशेष अदालत द्वारा पारित आरोपमुक्त करने के आदेश से सुरक्षित थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने उलट दिया है।
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पीठ ने कहा, ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड में नहीं लाया गया जिससे पता चले कि 21 महीने की इस अवधि के दौरान जब याचिकाकर्ता एक स्वतंत्र व्यक्ति रहा है, वह किसी गैरकानूनी गतिविधि में लिप्त रहा है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इसके विपरीत याचिकाकर्ता 2021 में विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और अब वह विधानसभा के मौजूदा सदस्य हैं।
इसमें कहा गया है कि एहतियातन हिरासत के मामलों को छोड़कर किसी व्यक्ति को पुलिस/न्यायिक हिरासत में रखने का उद्देश्य या तो निष्पक्ष और उचित जांच की सुविधा प्रदान करना है या दोषसिद्धि के बाद दंड के उपाय के रूप में है।
शीर्ष कोर्ट ने कहा, इस मामले में जांच पूरी हो गई है और याचिकाकर्ता अभी तक एक 'दोषी' अपराधी नहीं है। इसलिए, हमें नहीं लगता कि स्पेशल कोर्ट को उसे हिरासत में भेजने की अनुमति देने और फिर उसे जमानत के लिए आवेदन करने में सक्षम बनाने में उद्देश्य पूरा होगा।