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तेजी से पिघल रही है अंटार्कटिका की बर्फ, डूब सकता है भारत का ये शहर भी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Shilpa Thakur Updated Sun, 20 Jan 2019 01:52 PM IST
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global warming - फोटो : pexels.com

ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ती जा रही है। इसने पूरी दुनिया को एक बड़ी चिंता में डाल दिया है। ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघल रही है जिससे समुद्र का स्तर बढ़ता जा रहा है। नासा और नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी ने अंटार्कटिका पर हाल ही में एक शोध किया है। जिसमें हैरान कर देने वाले परिणाम सामने आए हैं। अध्ययन में वैज्ञानिकों को पता चला है कि यहां बर्फ पिघलने की रफ्तार काफी तेज है। 

280 फीसदी बढ़ी दर

शोधकर्ताओं का कहना है कि बीते 16 सालों में अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की दर 280 फीसदी बढ़ गई है। जिसके कारण वैश्विक समुद्र का स्तर बीते चार दशक में आधे इंच से भी अधिक बढ़ गया है। शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के अनुसार 1979 से लेकर 1990 तक के वर्षों में औसत रूप से 40 गीगाटन बर्फ पिघलती थी। इस स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। 

रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से लेकर 2017 के बीच में 252 गीगाटन बर्फ हर साल पिघलने लगी। बीते चार दशकों से ये रफ्तार बढ़ती जा रही है। वहीं अगर 1979 से लेकर 2001 के समय का अध्ययन देखें तो हर दशक सालाना 48 गीगाटन बर्फ पिघली है। 2001 से लेकर 2017 तक हर साल 134 गीगाटन बर्फ पिघली है। ये रिपोर्ट प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित की गई है।

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global warming - फोटो : pexels.com
ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ती जा रही है। इसने पूरी दुनिया को एक बड़ी चिंता में डाल दिया है। ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघल रही है जिससे समुद्र का स्तर बढ़ता जा रहा है। नासा और नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी ने अंटार्कटिका पर हाल ही में एक शोध किया है। जिसमें हैरान कर देने वाले परिणाम सामने आए हैं। अध्ययन में वैज्ञानिकों को पता चला है कि यहां बर्फ पिघलने की रफ्तार काफी तेज है। 

280 फीसदी बढ़ी दर

शोधकर्ताओं का कहना है कि बीते 16 सालों में अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की दर 280 फीसदी बढ़ गई है। जिसके कारण वैश्विक समुद्र का स्तर बीते चार दशक में आधे इंच से भी अधिक बढ़ गया है। शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के अनुसार 1979 से लेकर 1990 तक के वर्षों में औसत रूप से 40 गीगाटन बर्फ पिघलती थी। इस स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। 

रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से लेकर 2017 के बीच में 252 गीगाटन बर्फ हर साल पिघलने लगी। बीते चार दशकों से ये रफ्तार बढ़ती जा रही है। वहीं अगर 1979 से लेकर 2001 के समय का अध्ययन देखें तो हर दशक सालाना 48 गीगाटन बर्फ पिघली है। 2001 से लेकर 2017 तक हर साल 134 गीगाटन बर्फ पिघली है। ये रिपोर्ट प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित की गई है।

18 क्षेत्रों और 176 घाटियों का अध्ययन

global warming
वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में व्यापक अध्ययन किया है। इस महाद्वीप के 18 क्षेत्रों और 176 घाटियों में ये अध्ययन किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस गति के साथ अंटार्कटिका की बर्फ पिघल रही है, इससे आने वाले समय में समुद्र का स्तर काफी बढ़ जाएगा। नासा की हाई रेजोल्यूशन वाली तस्वीरों को देखने से पता चलता है कि सबसे अधिक बर्फ पूर्वी अंटार्कटिका में पिघल रही है।

इस इलाके में साल 1980 से पहले से ही तेज गति से बर्फ पिघल रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये क्षेत्र पारंपरिक रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है। इससे जुड़ी एक गंभीर बात ये भी है कि इस इलाके में पश्चिम अंटार्कटिका और अंटार्कटिक प्रायद्वीप से अधिक बर्फ मौजूद है।

बढ़ रहा है जलस्तर

बढ़ते तापमान के कारण हिमखंड पिघल रहे हैं, जिससे समुद्री जल स्तर बढ़ता जा रहा है। इससे बाढ़ का खतरा तो बढ़ ही रहा है साथ ही समुद्री पानी भी गर्म हो रहा है। जो समुद्री जीवों के लिए जानलेवा है। ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर ऐसे ही समुद्री जल का स्तर बढ़ता रहा तो इस शाताब्दी तक दुनियाभर में सागरों का जल 30 सेंटीमीटर तक ऊपर आ सकता है। 

शोधकर्ताओं के अनुसार सबसे अधिक बर्फ उन इलाकों की पिघल रही है, जो गर्म समुद्र से सटे हुए हैं। इसका एक कारण ये भी है कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही है और ओजोन परत घट रही है। इससे महासागर गर्म होते जा रहे हैं और बर्फीले क्षेत्रों में अधिक तेजी से बर्फ पिघल रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले समय में कई बड़े खतरे आने वाले हैं।

एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 1870 से 2004 के बीच समुद्री जल के स्तर में 19.5 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है। आने वाले 50 सालों में ये गति और अधिक बढ़ जाएगी। ये अध्ययन विज्ञान जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित किया गया है। वहीं इससे जुड़ा एक चौंकाने वाला खुलासा अंतर्देशीय पैनल की एक रिपोर्ट में किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 1990 से 2100 के बीच समुद्री जल का स्तर 9 सेंटीमीटर से 88 सेंटीमीटर के बीच बढ़ सकता है। 

द्वीपों के डूबने का खतरा बढ़ा

समुद्र के बढ़ते जल स्तर का खतरा केवल बाढ़ आने तक ही सीमित नहीं रहेगा। बल्कि इससे द्वीपों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। जल का स्तर बढ़ने से जमीन के लगातार डूबते जाने का खतरा होगा। इसके अलावा तटीय क्षेत्रों में पानी का खारापन भी बढ़ जाएगा। जो तटीय भूमि, तटीय जैव संपदा और वहां के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ सकता है। जिसके कारण लोगों को अपना आवास मजबूरन छोड़ना पड़ेगा।

क्या है इसके पीछे का कारण?

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दुनिया के 99 फीसदी आइसबर्ग ध्रुवों पर हिमचादर के रूप में हैं। ये दुनिया के लिए मीठे पानी के भंडार हैं। इनके टूटने की मुख्य वजह कार्बन उत्सर्जन है। इससे न केवल ग्लेशियर का तापमान बढ़ रहा है बल्कि वे पिघल भी रहे हैं। वहीं अगर कार्बन उत्सर्जन की बात करें, तो इसके लिए तीन गैस जिम्मेदार हैं। इन गैसों का इस्तेमाल एयरकंडीशन और रेफ्रिजरेटर में होता है। इसके अलावा कई तरह के उद्योगों में भी इनका इस्तेमाल होता है। 

क्रायोसैट 2 उपग्रह के जरिए शोधकर्ताओं ने पाया कि दक्षिणी अंटार्कटिक द्वीप पर 2009 के बाद अचानक 750 किलोमीटर की लंबाई वाले ग्लेशियर पिघलकर समुद्र में घुलने शुरू हो गए। जबकि 2009 से पहले ऐसा कुछ नहीं
था। पांच सालों के डाटा का विश्लेषण करने के बाद पता चला है कि हर साल 4 मीटर की दर से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इसके कारण गुरुत्व क्षेत्र पर भी प्रभाव पड़ रहा है।


पूरी पृथ्वी हो सकती है जलमग्न

अंटार्कटिका के तापमान में बीते 100 सालों में दो गुना अधिक वृद्धि हुई है। जिससे इसके बर्फीले क्षेत्रफल में कमी आई है। अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉसफेरिक रिसर्च के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग ऐसे ही जारी रही तो उत्तर ध्रुवीय समुद्र में साल 2040 तक बर्फ दिखनी ही बंद हो जाएगी। तब ये इलाका एक समुद्र में तब्दील हो चुका होगा। इस बर्फ की चादर के कम होने का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा और वहां के तापमान में वृद्धि होगी। वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि अगर यहां की सारी बर्फ पिघल गई तो समुद्र का स्तर 230 फीट तक बढ़ जाएगा, जिससे पूरी पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी।

मनुष्य पर भी पड़ रहा है बुरा प्रभाव

तापमान बढ़ने से कई तरह की बीमारियां बढ़ रही हैं। इसका एक कारण ये भी है कि ऐसा होने से साफ जल की कमी होती जा रही है, तेजी से शुद्ध हवा खत्म हो रही है, लोगों को ताजा फल और सब्जियां भी नहीं मिल पा रही हैं। इससे पशु पक्षियों का पलायन करना बढ़ रहा है और इनमें से कई प्रजातियां या तो लुप्त हो चुकी हैं, या फिर लुप्त होने की कगार पर हैं।

दुनिया के इन 10 शहरों पर खतरा

बर्फ पिघलने से सबसे अधिक प्रभावित वो शहर होंगे जो समुद्रे तट पर बसे हुए हैं। इन शहरों के डूबने का खतरा अधिक बढ़ जाएगा। इन दस शहरों में चीन का ग्वांग्झोऊ, अमेरिका का न्यू ऑरलीन्स, इक्वाडोर का ग्वायाक्विल, वियतनाम का हो चि मिन्ह सिटी, आईवरी कोस्ट का एबिड्जन, चीन का झानजिंग, भारत का मुंबई, बांग्लादेश का खुल्ना, इंडोनेशिया का पालेम्बंग, और चीन का शन्जेन शहर शामिल है।

मल्टी डेकडान कूलिंग और ग्लोबल वार्मिंग के बीच प्रतिस्पर्धा

global warming - फोटो : pexels.com
आने वाले समय में मल्टी डेकडान कूलिंग और ग्लोबल वार्मिंग के बीच प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। इसका मतलब है कि तापमान का बढ़ना तो जारी रहेगा, लेकिन धरती को ठंडा रखने वाले कारक भी अपना काम जारी रखेंगे। यह कहना है चाइनीज अकेडमी ऑफ सांइसेज के जिंगांग दाई का। उन्होंने कहा कि अगर मल्टी डेकडान जलवायुचक्र की पुनरावृत्ति होती है तो ये प्रतिस्पर्धा होगी।

19वीं शाताब्दी के बाद 2 डिग्री तक बढ़ा तापमान

अध्ययन में पता चला है कि 19वीं शाताब्दी के बाद से सतह के औसत तापमान में 2 डिग्री फारेनहाइट की वृद्धि हुई है। वहीं बीते 35 सालों में सतह की गर्माहट भी बढ़ी है, जिसका सीधा असर मौसम में होते बदलाव के तौर पर देखा जा सकता है। माना जा रहा है कि साल 2100 तक दुनिया के औसत तापमान में डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि होगी। जो इस वक्त 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। 

तापमान में 2 फीसदी वृद्धि होने पर औसतन महासागरों का जलस्तर 2 सेमी तक बढ़ जाता है। इसके साथ ही तटीय क्षेत्रों में भी पानी का स्तर अधिक बढ़ जाता है। बर्फ की मोटाई की अगर बात की जाए तो यह ध्रुवों पर 20 फीसदी तक कम हो गई है। ऐसा बीते दो दशक के दौरान हुआ है। 

पछुआ हवाएं भी हैं सबसे बड़ा कारण

ग्लेशियर पिघलने के लिए पछुआ हवाएं भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। शोध के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत के क्षरण के कारण हाल के दशकों में ये हवाएं अधिक प्रबल हो गई हैं। ये हवाएं दक्षिणी सागर से गर्म जल को ध्रुवों की ओर धकेलती हैं, जो ग्लेशियरों के पिघलने की सबसे अधिक वजह हैं।

अटलांटिक महासागर में जल स्तर बढ़ने की रफ्तार प्रशांत महासागर से काफी अधिक है। ग्लेशियर को पिघलने से रोकने के लिए सबसे जरूरी है ग्रीनहाउस गैसों की तादाद को कम करना। इसके अलावा समुद्री तटों के आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए भी इंतजाम शुरू किए जाने बेहद जरूरी हैं।
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