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AMU Minority Status: अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां, जानें सब कुछ

Wed, 31 Jan 2024 07:50 PM IST
आदर्श शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणियां की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी अल्पसंख्यक संस्थान के राष्ट्रीय महत्व का संस्थान होने में कुछ गलत नहीं है, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खास है। सुनवाई के दौरान एक वकील द्वारा राजनीतिक हस्तियों पर की गई टिप्पणियों पर कोर्ट ने कहा कि किसी भी राजनीतिक हस्तियों पर टिप्पणी न करें।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
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विस्तार
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) को अल्पसंख्यक दर्जा देने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमाम दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी अल्पसंख्यक संस्थान के राष्ट्रीय महत्व का संस्थान (Institution Of National Importance) होने में कुछ गलत नहीं है, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी खास है। गौरतलब है कि केंद्र ने कोर्ट में दायर अपनी लिखित दलील में कहा है कि एएमयू एक राष्ट्रीय संस्था हैं, इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जाना चाहिए। चाहे इस विश्वविद्यालय की स्थापना अल्पसंख्यक द्वारा की गई थी या नहीं।
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संविधान पीठ कर रही है मामले की सुनवाई
सात जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि हमें समझना होगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों के राष्ट्रीय महत्व की संस्था होने में कोई कुछ भी असंगत नहीं है। गौरतलब है कि संविधान का अनुच्छेद 30 शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने के अल्पसंख्यकों के अधिकार से संबंधित है। 1967 में एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता है। हालांकि जब संसद ने 1981 में एएमयू (संशोधन) अधिनियम पारित किया तो इसे अपना अल्पसंख्यक दर्जा वापस मिल गया था। 

हमें इस तरह की व्याख्या से बचना चाहिए- चंद्रचूड़
बाद में जनवरी 2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एएमयू(संशोधन) अधिनियम, 1981 के उस प्रावधान को खारिज कर दिया था, जिसके द्वारा यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया था। बुधवार को सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ वकील एनके कौल ने एएमयू को अल्पसंख्यक दर्जा देने का विरोध करने वाले एक पक्ष की ओर से बहस करते हुए पीठ को बताया कि 1981 का संशोधन बाशा फैसले के आधार को नहीं हटाता है। उन्होंने तर्क दिया कि 'स्थापना' शब्द को हटाकर और विश्वविद्यालय की परिभाषा में संशोधन करके, आप बाशा के आधार को नहीं हटा सकते, जो ऐतिहासिक तथ्य को मान्यता देता है। उन्होंने कहा कि किसी ऐतिहासिक तथ्य को कानूनी कल्पना या संसदीय आदेश द्वारा संशोधित या बदला नहीं जा सकता है। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि हमें इस तरह की व्याख्या करने से बहुत बचना चाहिए।
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राजनीतिक हस्तियों पर टिप्पणियां ठीक नहीं- चंद्रचूड़
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक वकील से कहा कि राजनीतिक हस्तियों पर टिप्पणी न करें। बता दें मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का बयान तब समाने आया जब वे एएमयू अल्पसंख्यक दर्जा को लेकर चल रही सुनवाई कर रहे थे। इस दौरान एक वकील ने एमयू के अल्पसंख्यक दर्जे से जुड़े एक सवाल पर बहस करते हुए पूर्व पीएम इंदिरा गांधी और अन्य का नाम लिया था। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि हम संवैधानिक कानून के क्षेत्र से दूर नहीं जाएंगे, राजनीतिक हस्तियों पर टिप्पणी न करें।
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