नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) को लेकर देशभर में हंगामा मचा हुआ है। कई राज्यों में लोग इस कानून को लेकर केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं। इसी बीच मोदी सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए हैं। इस प्रक्रिया के लिए गृह मंत्रालय ने कैबिनेट से 3,941 करोड़ रुपयों की मांग की है। एनपीआर का मकसद देश के सामान्य निवासियों की व्यापक पहचान का डेटाबेस बनाना है। इस डेटा में जनसांख्यिंकी के साथ बायोमेट्रिक जानकारी भी होगी।
देश के आजाद होने के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई थी। हर 10 में जनगणना होती है। इसे अब तक सात बार करवाया गया है हमारे पास वर्तमान में 2011 में हुई जनगणना के आंकड़े मौजूद हैं। 2021 की जनगणना को लेकर काम जारी है। जनगणना का रिकॉर्ड दर्ज करने में लगभग तीन साल का समय लगता है। जिसकी प्रक्रिया तीन चरणों में होगी।
एनपीआर देश के सभी सामान्य निवासियों का दस्तावेज होता है और नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों के अंतर्गत इसे स्थानीय, उप-जिला, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जाता है। छह महीने या उससे अधिक समय से स्थानीय क्षेत्र में रहने वाले किसी भी निवासी को एनपीआर मे आवश्यक रूप से पंजीकरण करना होता है। सरकार ने 2010 से देश के नागरिकों की पहचान का डेटाबेस जमा करने के लिए इसकी शुरुआत की।