उत्तराखंड में विकास की दिशा क्या होनी चाहिए? ग्लेशियरों के पिघलने और सड़कें बनने में एक विरोधाभास है। इससे कैसे निपटेंगे?
अजय टम्टा: यहां बहुत सी संभावनाएं हैं। यहां की भौगौलिक परिस्थितियां विशेष हैं। हम हॉर्टिकल्चर में बहुत अच्छा काम कर सकते हैं। अभी हम 10-12 फीसदी ही काम कर पा रहे हैं। यहां सब्जियों के उत्पादन, जड़ी-बूटियों के उत्पादन में बहुत संभावनाएं हैं। कोरोनाकाल में देशभर के लोग यहीं उत्तराखंड में रहकर काम कर रहे थे। यहां चारधाम के साथ-साथ पर्यटन के बाकी स्थल भी हैं। अब गर्मी देशभर में पड़ रही है, देहरादून में यातायात की समस्या है। एशिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर यहीं है। डेढ़ साल पहले यह ग्लेशियर पीछे चला गया। असल में बर्फ पीछे हो जाती है। अब सड़क वहां तक भी पहुंचेगी। उत्तराखंड में त्रासदियां भी आ रही हैं, लेकिन यह सिर्फ उत्तराखंड की वजह से है या दुनियाभर में यही दिक्कत है, यह देखना होगा।
उत्तराखंड का युवा यहां कैसे रुके?
अजय टम्टा: उत्तराखंड में पढ़ने-लिखने पर बहुत जोर है। डॉक्टर यहां काम आते हैं, लेकिन कोई इंजीनियर बन जाता है तो उसके लिए यहां नौकरियों के उतने अवसर नहीं हैं। ऐसे युवाओं के लिए यहां अवसर बनाने होंगे। यहां आईटी हब बनाना होगा। जहां रेल, सड़क और हवाई कनेक्टविटी है, वहां पर ये हब विकसित करने होंगे। हमारी कुछ प्रतिभाएं वापस भी आई हैं। लोगों ने अपनी पढ़ाई-करियर के साथ यहां भी रोजगार के मौके देखे। होम स्टे इसका एक उदाहरण है।
उत्तराखंड की जमीन कैसे बचाई जा सकती है?
अजय टम्टा: उत्तराखंड के भूस्वामियों के पास बड़ी जमीनें नहीं हैं। 2007 में उत्तराखंड सरकार की पहली कैबिनेट में इस पर चर्चा की गई थी। तब हमने रोक लगाई थी कि ढाई सौ वर्ग मीटर से ज्यादा भूमि बाहर के लोग नहीं खरीद सकेंगे। भविष्य का समय चुनौतीपूर्ण है। यहां के लोग भूमिविहीन न हों, इसकी चिंता करनी होगी। हिमाचल में यह नियम है कि कृषि की जमीन बाहर का व्यक्ति नहीं खरीद पाता। किन्नौर में अगर किसी बेटी से कोई बाहरी शादी करे, तो भी वह वहां जमीन नहीं खरीद सकता।