क्या सभी नागरिकों को केंद्र सरकार की ओर से मुफ्त कोरोना वैक्सीन लगवाई जानी चाहिए? अमर उजाला पोल में इस सवाल के जवाब में अधिकतर पाठकों का जवाब हां में रहा। कुल 81.48% पाठकों ने कहा कि सभी नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन लगाई जानी चाहिए। वहीं 18.52% ने नहीं में जवाब दिया।
कोरोना महामारी के इस दौर में वैक्सीन को सबसे बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है। पूरे देश में टीकाकरण अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। सरकारी और निजी अस्पतालों में वैक्सीनेशन मुहिम चल रही है। सरकारी में टीका मुफ्त में लगाया जाता है, लेकिन निजी अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, वहीं दुनिया के कई देशों में वैक्सीनेशन ड्राइव मुफ्त में चलाई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत में वैक्सीन लगवाने के लिए पैसे क्यों खर्च करने पड़ रहे हैं। क्या सरकार वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सब्सिडी नहीं दे रही है या कंपनियां अपने फायदे के लिए पैसे ले रही हैं।
भारत के निजी अस्पतालों में वैक्सीन लेने के लिए 900 से लेकर 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। भारत दुनिया में इकलौता देश है, जहां प्राइवेट में वैक्सीन के लिए इतनी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। विदेश में किसी भी देशों में वैक्सीन के लिए पैसे नहीं देने होते हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और कनाडा में टीका मुफ्त में लगाया जाता है। यहां पर वैक्सीन लेने के लिए जेब ढीली नहीं करनी पड़ती है। आइए जानते हैं कि विदेश में जब टीका मुफ्त में मिल रहा है तो अपने देश में इसके बदले पैसे क्यों खर्च करने पड़ते हैं।
सरकारें उठाती हैं पूरा खर्च
दरअसल, विदेश में वैक्सीन का खर्च सरकार उठाती है। अमेरिकी सरकार ने मुआवजे का एक कोष बनाया है। यदि किसी को वैक्सीन की वजह से किसी प्रकार का साइड इफेक्ट होता है तो सरकार उस कोष से उसे आर्थिक मदद मुहैया कराती है। वहीं भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से यहां पर ऐसा कोई राहत कोष नहीं बनाया गया है। यहां पर कंपनियां खुद ही जिम्मेदारी उठाती है। ऐसे में लोगों को वैक्सीन के बदले पैसे देने पड़ते हैं।