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केंद्र सरकार वोटों के ध्रुवीकरण का एजेंडा सेट कर रही है: अजय साहनी

Wed, 18 Dec 2019 01:26 AM IST
संजीव कुमार झा शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  •  इंस्टीट्यूट ऑफ कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट के निदेशक हैं साहनी
  •  नार्थ-ईस्ट, दिल्ली, बंगाल में हिंसक विरोध प्रदर्शन का डायनमिक्स अलग-अलग
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विस्तार
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जब रोम जल रहा था तो नीरो चैन की बंसी बजा रहा था। क्या कुछ ऐसी ही हालत देश में नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों की है। सत्ता पक्ष मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर आरोप लगा रहा है और कांग्रेस केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है।

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वहीं विरोध प्रदर्शन की यह आग असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल से निकलकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक पहुंचने लगी है। माना जा रहा है कि यदि कुछ कारगर उपाय न हुए तो अगले कुछ दिनों तक इसके फैलते जाने का अंदेशा जताया जा रहा है। इस बीच इंस्टीट्यूट ऑफ कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट के निदेशक अजय साहनी ने कहा कि केंद्र सरकार वोटों के ध्रुवीकरण का एजेंडा सेट कर रही है।


अलग-अलग हैं हिंसक प्रदर्शन के डायनामिक्स

अजय साहनी का कहना है कि असम, त्रिपुरा का हिंसक प्रदर्शन पश्चिम बंगाल से अलग है। पश्चिम बंगाल का हिंसक विरोध प्रदर्शन दिल्ली से अलग है। आगे इसके डायनामिक्स और बदलने की संभावना है। इंस्टीट्यूट ऑफ कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट के निदेशक का कहना है कि असम के हिंसक प्रदर्शन के पीछे वजह हिंदू हैं।

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वहां बांग्लादेश से आने वाले लाखों लोगों(यह संख्या करोड़ तक संभव) को नागरिकता देने के बाद असम के ट्राइबल, मूल लोगों की भाषा, संस्कृति, बोली सब पर खतरा मंडरा रहा है। वह बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक बन जाएंगे। यह बंगाली बनाम नॉन बंगाली का मसला है। हालांकि यह भाजपा के एजेंडे को सूट करता है।

पश्चिम बंगाल का प्रदर्शन नागरिकता कानून से ज्यादा एनआरसी के एजेंडे को लेकर मुसलमानों की सह पर आगे बढ़ रहा है। उन्हें आगे राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण का भय सता रहा है। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के पास भड़का प्रदर्शन, सीलमपुर, जफराबाद का प्रदर्शन मुसलमानों के भीतर मुसलमान विरोधी सरकार की बनी छवि से बढ़ते डर के कारण है।

सबको लग रहा है कि सरकार एक के बाद एक कानून, प्रावधान को लाकर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा लागू करने पर तुली है। लोग आगे के खतरों को देखकर सड़क पर उतर रहे हैं।

सरकार और भाजपा नरेटिव सेट कर रही है

अजय साहनी का कहना है कि पिछले कुछ दिनों का प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री का बयान देखिए। मेरे ख्याल में भारत की धर्म निरपेक्ष छवि के कहीं से भी अनुरुप नहीं है।  अजय साहनी को भी इस तरह से नागरिकता कानून में हुआ संशोधन समझ में नहीं आता। वह इसे भारत के संविधान की आत्मा के विरुद्ध मानते हैं।

अजय साहनी सवाल उठाते हैं कि आखिर जामिया के पास हुए हिंसक प्रदर्शन में कौन लोग हैं? ये मुसलमान हैं या इस रूप में कोई अराजक तत्व या फिर इस तरह के हालात पैदा करने के इरादे से आए लोग? आप असम को ही देखिए। वहां पिछले साल सरकार ने लोगों से संवाद करने का वादा किया था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

लोगों की चिंताए दूर करने के प्रयास नहीं हुए। पहले वहां एनआरसी, फिर नागरिकता कानून में संशोधन हो गया। मेरे ख्याल में यह ध्रुवीकरण की राजनीति है। यह अपने सोचे-समझे एजेंडे के साथ आगे बढ़ाई जा रही है।

नागरिकता और एनआरसी का अंतर डरा रहा

अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि देश का मुसलमान डरा हुआ है। वह कहते हैं कि खुद उनके पास सरकार के किसी प्राधिकरण द्वारा जारी जन्म का प्रमाण पत्र नहीं है। अपनी पुश्तों की नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है। देश के अधिकांश मुसलमानों के पास भी नहीं होगा।

ऐसे में एक तरफ नागरिकता का कानून और दूसरी तरफ एनआरसी में पंजीकरण के लिए जरूरी दस्तावेज का फर्क डरा रहा है। असम में पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार, वायुसेना के पूर्व अधिकारी समेत अन्य की तरह लोगों के पास नागरिकता से वंचित होने का डर बढ़ रहा है।

इस तरह से यह एक टकराव पैदा करने की कोशिश है। यह विचारधारा का नरेटिव खड़ा करने का प्रयास है। इसका मकसद मुसलमानों को संदेश देना है कि वह आऊट साइडर हैं और यदि भारत में रहना चाहते हैं तो डर कर रहें।

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लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती

अजय साहनी का कहना है कि यह भारत जैसे लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है। क्योंकि विपक्ष की स्थिति बहुत कमजोर है। आप कह सकते हैं विपक्ष हाशिए पर है। इसके कारण सरकार की मंशा पर शक की लगातार गुंजाइश बढ़ रही है। सरकार भी ऐसी ही स्थिति चाहती है।

इसलिए केंद्र सरकार अर्थ व्यवस्था, बेरोजगारी, किसान, युवा का हित और देश के विकास के बजाय हिन्दुत्व का संदेश देने वाले सभी एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ रही है।
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