अजय साहनी का कहना है कि पिछले कुछ दिनों का प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री का बयान देखिए। मेरे ख्याल में भारत की धर्म निरपेक्ष छवि के कहीं से भी अनुरुप नहीं है। अजय साहनी को भी इस तरह से नागरिकता कानून में हुआ संशोधन समझ में नहीं आता। वह इसे भारत के संविधान की आत्मा के विरुद्ध मानते हैं।
अजय साहनी सवाल उठाते हैं कि आखिर जामिया के पास हुए हिंसक प्रदर्शन में कौन लोग हैं? ये मुसलमान हैं या इस रूप में कोई अराजक तत्व या फिर इस तरह के हालात पैदा करने के इरादे से आए लोग? आप असम को ही देखिए। वहां पिछले साल सरकार ने लोगों से संवाद करने का वादा किया था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
लोगों की चिंताए दूर करने के प्रयास नहीं हुए। पहले वहां एनआरसी, फिर नागरिकता कानून में संशोधन हो गया। मेरे ख्याल में यह ध्रुवीकरण की राजनीति है। यह अपने सोचे-समझे एजेंडे के साथ आगे बढ़ाई जा रही है।
अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि देश का मुसलमान डरा हुआ है। वह कहते हैं कि खुद उनके पास सरकार के किसी प्राधिकरण द्वारा जारी जन्म का प्रमाण पत्र नहीं है। अपनी पुश्तों की नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है। देश के अधिकांश मुसलमानों के पास भी नहीं होगा।
ऐसे में एक तरफ नागरिकता का कानून और दूसरी तरफ एनआरसी में पंजीकरण के लिए जरूरी दस्तावेज का फर्क डरा रहा है। असम में पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार, वायुसेना के पूर्व अधिकारी समेत अन्य की तरह लोगों के पास नागरिकता से वंचित होने का डर बढ़ रहा है।
इस तरह से यह एक टकराव पैदा करने की कोशिश है। यह विचारधारा का नरेटिव खड़ा करने का प्रयास है। इसका मकसद मुसलमानों को संदेश देना है कि वह आऊट साइडर हैं और यदि भारत में रहना चाहते हैं तो डर कर रहें।
अजय साहनी का कहना है कि यह भारत जैसे लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है। क्योंकि विपक्ष की स्थिति बहुत कमजोर है। आप कह सकते हैं विपक्ष हाशिए पर है। इसके कारण सरकार की मंशा पर शक की लगातार गुंजाइश बढ़ रही है। सरकार भी ऐसी ही स्थिति चाहती है।
इसलिए केंद्र सरकार अर्थ व्यवस्था, बेरोजगारी, किसान, युवा का हित और देश के विकास के बजाय हिन्दुत्व का संदेश देने वाले सभी एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ रही है।