ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि एटक की अगुवाई में बुलाया गया दो दिवसीय भारत बंद कार्यक्रम केवल यहीं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह विभिन्न विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से 2024 तक चलता रहेगा। उनका उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनावों तक देश में केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाना है, जिससे इस सरकार को सत्ता से हटाया जा सके। उन्होंने कहा कि वे श्रमिक संगठन हैं और उनका काम केवल माहौल बनाना है। बाकी काम राजनीतिक दलों का है। यदि वे मजबूती से काम करते हैं तो केंद्र सरकार को अपदस्थ करना मुश्किल नहीं होगा। वाम श्रमिक संगठनों की महासचिव ने यह बात ऐसे मौके पर कही है, जब किसानों के बड़े विरोध-प्रदर्शन के बाद भी भाजपा चार राज्यों में प्रचंड ताकत के साथ सरकार बनाने में सफल रही है।
एटक की महासचिव अमरजीत कौर ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि किसान नेता सरकार की चाल में फंस गए। वे ‘मिशन यूपी’ पर ध्यान केंद्रित नहीं रख सके और सरकार के द्वारा कृषि कानूनों के वापस लेने के बाद अपने घरों को लौट गए। यदि किसान केंद्र की चाल में न फंसते और अपना आंदोलन जारी रखते तो भाजपा को उत्तर प्रदेश से अपदस्थ किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि किसान कानूनों की वापसी केंद्र सरकार की बहुत सोची-समझी चाल थी क्योंकि उसे पता था कि यदि कानून वापस न होता, तो उसका सूपड़ा साफ हो जाता।
उन्होंने कहा कि हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 200 के लगभग ऐसी विधानसभा सीटें जीती हैं, जहां उसकी जीत का अंतर 200 से 1000 वोटों का ही रहा है। यदि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी रहता, तो उसे इन सीटों पर जीत हासिल न होती और उस परिस्थिति में चुनाव परिणाम कुछ और होता।
इसके पहले संयुक्त किसान मोर्चा के नेता योगेंद्र यादव का एक बयान भी चर्चा में रहा था। योगेंद्र यादव ने कहा था कि किसान संगठनों की जिम्मेदारी चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल बनाना था। इसके बाद की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की थी, जिसे उन्हें पूरा करना चाहिए था। योगेंद्र यादव के इस बयान के बाद भाजपा को यह आरोप लगाने का अवसर मिला था कि किसान आंदोलन का उद्देश्य किसानों का हित करना नहीं था, बल्कि किसानों के नाम पर राजनीति करना था। यह आरोप वह किसान आंदोलन की शुरुआत से ही लगाती आ रही थीं।
वाम श्रमिक संगठनों का आरोप है कि सरकार पीएसयू, बैंक, बीमा निगम और अन्य सभी लाभकारी संस्थाओं को बेचने का काम कर रही है। इससे बाजार में निजी कंपनियों का दबदबा हो जाएगा और इससे गरीबों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। कोरोना जैसे आपातकाल में सार्वजनिक सेक्टर ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया है और केवल इन्हीं के प्रदर्शन के बल पर लोगों की जान बचाना संभव हो सका है। श्रमिक संगठनों का तर्क है कि कोरोना के आपात काल में जिस समय प्राइवेट कंपनियां लाभ कमाने के लिए लोगों की जान की कीमत पर भारी मुनाफा कमा रही थीं, उसी समय सार्वजिनक क्षेत्र लोगों की सेवा में जुटे हुए थे। ऐसे में सरकार को सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की नीति से परहेज करना चाहिए।