पंजशीर में जब पाकिस्तानी सेना और इसके अफसर दिखाई पड़े तो अमेरिका, भारत, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों की चिंता बढ़ गई। इन देशों की सीक्रेट एजेंसियां दोबारा से अफगानिस्तान में सक्रिय हो उठीं। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने कतर का दौरा किया। इस्रायल के विदेशी मंत्री से बात की। उन्होंने दोहा के ट्रांजिट कैंप का दौरा किया, जहां से हजारों लोगों को बाहर ले जाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने कहा, 'उन्हें मालूम था कि हमारे जाने के बाद चीन, तालिबान के साथ बात करने की कोशिश करेगा। चीन को तालिबान से काफी दिक्कत है, इसलिए वह अभी से ही उससे संबंध स्थापित करना चाहता है। चीन ही नहीं बल्कि रूस, पाकिस्तान और ईरान भी इसी राह पर हैं।
पीएम मोदी ने की पुतिन से बात
भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अगस्त को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर बात की थी। अफगानिस्तान के मसले को लेकर इन दोनों नेताओं की बातचीत को बहुत अहम माना गया था। वजह, रूस का तालिबान के साथ लगातार संपर्क में रहना है। तालिबान सरकार ने अपने समारोह में चीन, पाकिस्तान और ईरान के अलावा रूस को भी आमंत्रित किया है। पीएम मोदी और व्लादिमीर पुतिन की बातचीत के बाद ही रूसी एनएसए निकोलाई पेशत्रेव भारत के दौरे पर पहुंचे हैं। दोनों देशों की सीक्रेट एजेंसियों के प्रमुख, एनएसए की बैठक में शामिल हुए हैं। सूत्रों का कहना है, दोनों देशों की सीक्रेट एजेंसियों ने सिक्योरिटी को लेकर कई तरह के अलर्ट और संभावनाओं को लेकर बातचीत की है।
अगले कुछ दिनों में अमेरिकी सीक्रेट एजेंसी 'सीआईए' के प्रमुख विलियम बर्न्स भारत आ सकते हैं। उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत दोभाल बातचीत करेंगे। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में कई ऐसे लोगों को शामिल किया है, जो किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन या देशों की सूची में आतंकी रहे हैं।
भारत के खिलाफ तालिबान के इस्तेमाल की मंशा
पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार ने एक टीवी चर्चा में कहा, पाकिस्तान की मंशा है कि अब वह अफगानिस्तान के जरिए भारत को परेशान करे। पड़ोसी देश यही रणनीति बना रहा है कि किसी भी तरह तालिबानी सरकार का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाए। अभी कुछ दिनों तक तालिबान की सरकार कमजोर रहेगी। पाकिस्तान और चीन, इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान को 34 बिलियन डॉलर की सहायता दी थी। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने साफतौर पर कह दिया था कि पाकिस्तान ने इस राशि का इस्तेमाल आतंकियों को मदद पहुंचाने में किया है। अब उसका प्रयास है कि तालिबान की सरकार इतनी कमजोर हो कि वह उसके अंगूठे के नीचे रहे। चीन भी पाकिस्तान के साथ आ गया है। उसकी भी वैसी ही मंशा है। वह भी अफगानिस्तान में खुद का 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' चाहता है।
चीन ने उइगर मुस्लिमों के साथ अमानवीय व्यहार किया है। इस बाबत वह कभी चर्चा नहीं करता। उसने एक मिलियन लोगों को घेर कर जबरदस्ती कैंपों में रोक रखा है। दुनिया की नजरों से अपनी हरकतों को छिपाने के लिए चीन ने झिंजियांग प्रांत में 'इस्लामिक चरमपंथी संगठनों' की उपस्थिति की खबर फैला दी है। इससे चीन को यह कहने में आसानी रहती है कि उसके नियंत्रण वाले झिंजियांग प्रांत में आतंकी समूह सक्रिय हैं।
लिथियम खजाने पर भी चीन की नजर
अफगानिस्तान में लिथियम के खजाने पर भी चीन की नजर है। वखजीर दर्रे के साथ चीन और अफगानिस्तान की 80 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। चीन चाहता है कि यह व्यापार के लिए खुल जाए। रणनीतिक कॉरिडोर 'बेल्ट-एंड-रोड इनिशिएटिव' और 'चीन-पाकिस्तान-अफगानिस्तान कॉरिडोर', इन बड़ी योजनाओं को अफगानिस्तान की मदद से जल्द पूरा किया जा सकता है।