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सियासत: क्या उत्तर प्रदेश का चुनाव ‘अयोध्या’ से लड़ा जाएगा, सभी पार्टियों के फोकस में राम की नगरी है

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Wed, 08 Sep 2021 06:50 PM IST

सार

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ‘अयोध्या’ की अहम भूमिका होने वाली है। राम मंदिर निर्माण शुरू हो जाने के बाद भी उत्तर प्रदेश के चुनाव के केंद्र में ‘राम’ ही हैं। 
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राम मंदिर निर्माण - फोटो : अमर उजाला

अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के केंद्र में अभी से ‘अयोध्या’ है। यह कुछ राजनीतिक दलों के लिए प्रमुख फैक्टर है तो किसी के लिए प्रयोगशाला। कोई पार्टी ब्राह्मणों को यहीं से रिझाने की कोशिश कर रहा है तो कोई  मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए यहां पड़ाव डाल रहा है। दरअसल इस धार्मिक शहर में किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम का न केवल अयोध्या में, बल्कि पूर्वांचल और राज्य के अन्य हिस्सों में भी असर होता है, इसलिए सभी पार्टियां इस नगरी से अपने मतदाताओं को साधने की कोशिश में है।

पहले सिलसिलेवार समझिए कि कैसे सभी पार्टियों और घटनाओं के मुख्य फोकस में अभी अयोध्या है।
 

.चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन नवंबर को अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम में शामिल होंगे। 

.उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से ही चुनाव लड़ने की अटकलें हैं। अयोध्या से बीजेपी विधायक वेद प्रकाश गुप्ता योगी के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं। 



. मायावती ने 23 जुलाई से यूपी के 18 मंडलों में ब्राह्मण सम्मेलन करने का एलान किया,अयोध्या के धार्मिक महत्व को महसूस करते हुए इसकी शुरुआत यहीं से हुई। 

.आईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कल यूपी में अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार अयोध्या में रैली कर शुरू किया। वे यहां से मुस्लिमों को साधने की कोशिश में है।

.सपा नेता और अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे ने मीडिया को बताया था हमारे अध्यक्ष अखिलेश यादव जी अपने राज्य के दौरे की शुरुआत करेंगे और अयोध्या आएंगे। 

भाजपा के लिए अहम, दूसरी पार्टियां महत्व को भुनाने की कोशिश में
भारतीय जनता पार्टी के चुनाव एजेंडे में अयोध्या और राम हमेशा रहे हैं। इसलिए हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा के लिए अयोध्या महत्वपूर्ण है। अन्य पार्टियां भाजपा के हिंदुत्व की काट नहीं ढूंढ पा रही तो अयोध्या के महत्व को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। जो भी पार्टी 2022 में जीतना चाहती है, उसके लिए यहां अपनी उपस्थिति दिखाना महत्वपूर्ण हो गया है।
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उत्तर प्रदेश की राजनीति की नब्ज पकड़ने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं ऐसा लगता है कि सारी राजनीतिक पार्टियां उलझन में है। राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह बड़ा मुद्दा नहीं रहा, लेकिन फिर भी इस मुद्दे को गरमाए रखना है। भाजपा को इसका जो ज्यादा फायदा मिलना तो वह मिल गया, लेकिन दूसरी पार्टियां उसके ट्रैप में है। दूसरी पार्टियां इस उम्मीद में कि यदि वे भी इस गेम में रहें तो उन्हें भी फायदा होगा। भाजपा की देखादेखी ही दूसरी पार्टियां भी इसमें कूद गई हैं। भाजपा के इशारे पर ही मुस्लिम वोट बैंक को बांटने के लिए ओवैसी आ गए हैं। सभी पार्टियां अयोध्या को एक फैक्टर बनाने की कोशिश में हैं, लेकिन यह दांव कितना कारगार होगा यह देखने की बात है। 

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राम मंदिर निर्माण - फोटो : अमर उजाला
अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के केंद्र में अभी से ‘अयोध्या’ है। यह कुछ राजनीतिक दलों के लिए प्रमुख फैक्टर है तो किसी के लिए प्रयोगशाला। कोई पार्टी ब्राह्मणों को यहीं से रिझाने की कोशिश कर रहा है तो कोई  मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए यहां पड़ाव डाल रहा है। दरअसल इस धार्मिक शहर में किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम का न केवल अयोध्या में, बल्कि पूर्वांचल और राज्य के अन्य हिस्सों में भी असर होता है, इसलिए सभी पार्टियां इस नगरी से अपने मतदाताओं को साधने की कोशिश में है।

पहले सिलसिलेवार समझिए कि कैसे सभी पार्टियों और घटनाओं के मुख्य फोकस में अभी अयोध्या है।
 

.चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन नवंबर को अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम में शामिल होंगे। 

.उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से ही चुनाव लड़ने की अटकलें हैं। अयोध्या से बीजेपी विधायक वेद प्रकाश गुप्ता योगी के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं। 

. मायावती ने 23 जुलाई से यूपी के 18 मंडलों में ब्राह्मण सम्मेलन करने का एलान किया,अयोध्या के धार्मिक महत्व को महसूस करते हुए इसकी शुरुआत यहीं से हुई। 

.आईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कल यूपी में अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार अयोध्या में रैली कर शुरू किया। वे यहां से मुस्लिमों को साधने की कोशिश में है।

.सपा नेता और अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे ने मीडिया को बताया था हमारे अध्यक्ष अखिलेश यादव जी अपने राज्य के दौरे की शुरुआत करेंगे और अयोध्या आएंगे। 

भाजपा के लिए अहम, दूसरी पार्टियां महत्व को भुनाने की कोशिश में
भारतीय जनता पार्टी के चुनाव एजेंडे में अयोध्या और राम हमेशा रहे हैं। इसलिए हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा के लिए अयोध्या महत्वपूर्ण है। अन्य पार्टियां भाजपा के हिंदुत्व की काट नहीं ढूंढ पा रही तो अयोध्या के महत्व को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। जो भी पार्टी 2022 में जीतना चाहती है, उसके लिए यहां अपनी उपस्थिति दिखाना महत्वपूर्ण हो गया है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति की नब्ज पकड़ने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं ऐसा लगता है कि सारी राजनीतिक पार्टियां उलझन में है। राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह बड़ा मुद्दा नहीं रहा, लेकिन फिर भी इस मुद्दे को गरमाए रखना है। भाजपा को इसका जो ज्यादा फायदा मिलना तो वह मिल गया, लेकिन दूसरी पार्टियां उसके ट्रैप में है। दूसरी पार्टियां इस उम्मीद में कि यदि वे भी इस गेम में रहें तो उन्हें भी फायदा होगा। भाजपा की देखादेखी ही दूसरी पार्टियां भी इसमें कूद गई हैं। भाजपा के इशारे पर ही मुस्लिम वोट बैंक को बांटने के लिए ओवैसी आ गए हैं। सभी पार्टियां अयोध्या को एक फैक्टर बनाने की कोशिश में हैं, लेकिन यह दांव कितना कारगार होगा यह देखने की बात है। 

अयोध्या में संतों से बातचीत करते सीएम - फोटो : अमर उजाला
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, भाजपा ने मतदाताओं से वादा किया था कि अगर पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो वे अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू करेंगे। पांच अगस्त 2020 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उस वादे को पूरा किया जब उन्होंने मंदिर निर्माण की शुरुआत के लिए अयोध्या में भूमि पूजन किया। 

मंदिर का निर्माण जोरों पर चल रहा है। इस मुद्दे को आगे कैसे राजनीति की चर्चा के केंद्र में रखा जाए इसके लिए भाजपा ने पूरी रणनीति भी तैयार कर ली है। भाजपा ने 2022 में 403 में से 300 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, इसलिए अयोध्या के जरिए चुनावी नैया पार करने की कोशिश है। इसी रणनीति के तहत अयोध्या में विकास कार्यों का जायजा खुद सीएम योगी लेते रहते हैं। 

अयोध्या को नए विकसित शहर के रूप में दिखाने की कोशिश 
उत्तर प्रदेश सरकार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशन और रामायण सर्किट के तहत कई अन्य परियोजनाओं के साथ अयोध्या को नए विकसित शहर के रूप में दिखाने की कोशिश कर रही है। उम्मीद है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या रोजाना एक लाख तक हो जाएगी, जो इस समय पांच हजार प्रतिदिन है। निश्चित तौर पर भाजपा चुनाव में इन उपलब्धियों का फायदा उठाने की कोशिश करेगी। 

पिछले साढ़े चार सालों में, योगी आदित्यनाथ 20 से अधिक बार अयोध्या का दौरा कर चुके हैं, जो भाजपा के लिए इस स्थान के महत्व को बताती है। जून में पीएम ने खुद अयोध्या की विकास योजना की समीक्षा की थी। 30 अगस्त से रामायण कॉन्क्लेव का शुभारंभ अयोध्या से हुआ है और 65 दिन बाद एक नवंबर को अयोध्या में ही इसका समापन होगा। राम की कथा, लोक संगीत,नाटक,रामायण गान के जरिए राम की गाथा का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।

बीबीसी के पूर्व पत्राकर राम दत्त त्रिपाठी बताते हैं कि भाजपा के लिए अयोध्या कितना महत्वपूर्ण है इस बात को ऐसे समझिए कि योगी अक्सर अयोध्या जाते हैं। भाजपा का यह सांस्कृतिक एजेंडा है। 1989 से भाजपा ने यह वादा किया था कि मंदिर बनाएंगे। अब मंदिर निर्माण में बाधाएं हट गई हैं, फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, इसलिए इस चुनाव में भाजपा इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करेगी। दूसरी पार्टियां मंदिर के मुद्दे को तो नहीं लपक सकती लेकिन वे यह दिखाने की कोशिश कर रही हैं कि वे इस फैसले में साथ हैं। 

त्रिपाठी यह भी बताते हैं कि अयोध्या के साथ-साथ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर भी काम चल रहा है। अयोध्या की उपलब्धि बताकर भाजपा उत्तर प्रदेश की जनता को यह बताने की कोशिश करेगी कि काशी और मथुरा का विकास भी वही कर सकती है। एक तरफ जहां विपक्ष प्रशासनिक मुद्दे उठाएगा, भाजपा हिंदुत्व का मुद्दा उठाएगी।  
 

अयोध्या पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala
पहले भी हिंदुत्व का एजेंडा ‘अयोध्या’ से होकर  गुजरा है
ऐसा नहीं है कि हिंदुत्व कार्ड और राम मंदिर निर्माण  को लेकर अयोध्या की परिक्रमा केवल इस चुनाव में होगी। इससे पहले भी नेता इस एजेंडे को लेकर अयोध्या से होकर गुजरें हैं। 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री और राहुल के पिता राजीव गांधी ने कांग्रेस के लोक सभा चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या से ही की थी। 

त्रिपाठी बताते हैं 1948 में देश के प्रतिष्ठित समाजवादी राजनेता आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ कांग्रेस ने बरहज (देवरिया) से बाबा राघव दास को अपना प्रत्याशी बनाया। बाबा राघव दास वैसे तो गांधीवादी और विनोबा के शिष्य माने जाते थे, लेकिन इस चुनाव में उन्हें हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया था। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण इस चुनाव में अहम मुद्दा बन गया था और बाबा राघव दास को समर्थन मिलने लगा था। समाजवाद के पुरोधा नरेंद्र देव चुनाव हार गए।

राम मंदिर को लेकर सियासत
राम मंदिर को लेकर सियासत की शुरूआत मोटे तौर पर 11 जून, 1989 में भाजपा के पालमपुर अधिवेशन से मानी जा सकती है, जहां पार्टी ने राम जन्मभूमि आंदोलन को समर्थन देने का फैसला किया था। हालांकि इस प्रस्ताव को खुद आडवाणी ने तैयार किया था, पर भाजपा के दूसरे बड़े नेता इस फैसले के पक्ष में नहीं थे। 

उससे पहले अस्सी के दशक में ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की श्रीपति मिश्र सरकार ने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद परिसर से जुडी 42 एकड़ भूमि राधा पार्क के लिए अधिग्रहित कर ली थी। सरयू के घाटों की खुदाई करके राम की पैड़ी बनाई गई थी। इसी दौरान तब के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी अयोध्या का दौरा किया था। इसके बाद संघ में हलचल शुरू हुई और सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से गहन चर्चा की।

संघ के करीबी माने जाने वाले महाराज विजय कौशल और कुछ लोगों ने हिंदू जागरण मंच के बैनर तले छह मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें पूर्व उप प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नन्दा, कांग्रेस के बड़े नेता और सरकार में मंत्री रहे दाऊ दयाल खन्ना भी शामिल हुए। इसी सम्मेलन में पहली बार राम जन्मभूमि मुक्ति का प्रस्ताव पारित हुआ। आगे जो कुछ भी हुआ वो इतिहास में दर्ज है। राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं इस चुनाव में भाजपा और दूसरी पार्टियों को राम का कितना आशीर्वाद मिलता है यह तो नतीजे ही बताएंगे। 


 
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