कतर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल और तालिबान नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टानेकजई की पहली बार हुई मुलाकात।
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दुनिया की महाशक्ति संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तो अफगानिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर हुआ ही, जाते-जाते उसने भारत जैसे देशों को भी तालिबान से रिश्ता रखने के लिए मजबूर कर दिया। भारतीय विदेश सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार हमारे पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं है। राष्ट्रीय हितों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई से भारत के कतर में राजदूत दीपक मित्तल की बातचीत पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश सेवा के अधिकारी ने कहा कि अब कुछ तो होना ही था। काबुल में तो फिलहाल तालिबान है और वास्तविकता यह भी है कि अमेरिका के आखिरी सैनिक जा चुके हैं।
विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार भी मानते हैं कि हालात बदल चुके हैं। बदली परिस्थिति के हिसाब से चलना पड़ता है। वाइस एयर मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह का कहना है कि अभी हमारे कुछ लोग वहां हैं, जिन्हें निकालना है। इसके अलावा कई और चुनौतियां हैं। इसे देखते हुए जो वहां शासन करेगा, उससे बातचीत करनी पड़ेगी। कूटनीतिक रिश्ते भी रखने ही पड़ेंगे। पूर्व वरिष्ठ सैन्य अधिकारी अरुण मिश्रा के अनुसार क्षेत्रीय सुरक्षा सबसे अहम है। दूसरे जब चीन और रूस जैसे देश सॉफ्ट कॉर्नर लेकर चल रहे हैं तो भारत को भी अपने हितों के हिसाब से निर्णय लेना चाहिए। एक बात और, जिस तरह से तालिबान संकेत दे रहा है, उससे यह मुल्ला उमर के नेतृत्व और अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के प्रभाव वाले तालिबान से कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा है।
अमेरिका की जल्दबाजी से पैदा हुईं तमाम परिस्थितियां
सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिका की अचानक अफगानिस्तान से निकलने की जल्दबाजी ने तमाम परिस्थितियां पैदा की हैं। ऐसा लग रहा है कि जैसे अमेरिका ने अपने तमाम सहयोगी देशों को विश्वास में नहीं लिया। हालांकि लोगों को उम्मीद है कि जल्द ही तालिबान के नेता अफगानिस्तान में स्थिति को सामान्य होने देंगे। विदेश सेवा से अवकाश प्राप्त एसके शर्मा कहते हैं कि तालिबान के ऊपर अपने देश के नागरिकों और विश्व समुदाय का भारी दबाव है। उन्हें नैतिक और नीतिक फैसले लेने होंगे।