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अफीम पर चलेगी अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था: ड्रग तस्करी से कमाएंगे अरबों डॉलर, दुनिया में बढ़ेगा नार्को टेररिज्म

सार

विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान के सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक 1978 से लेकर 1992 के बीच अफीम का उत्पादन बढ़ना शुरू हुआ। अफीम की पैदावार से मिलने वाली रकम को इन कबीलाई लोगों ने अपने संगठन तालिबान को मजबूत करने के लिए न सिर्फ हथियार खरीदने शुरू किए, बल्कि इसकी दुनियाभर में तस्करी भी करनी शुरू कर दी...
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अफ़ीम - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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तालिबानियों ने करीब ढाई दशक पहले अपने शासन के दौर में अफगानिस्तान के लिए जो बजट बनाया था, उसमें महज सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए और अपने लड़ाकों को देने वाले वेतन का ही प्रावधान दिया था। देश की अर्थव्यवस्था कैसे आगे बढ़े इसके लिए अफगानिस्तान के तालिबानी शासकों के बजट में कुछ भी नहीं था। नतीजतन तालिबानियों ने अफीम के कारोबार को इतना बढ़ाया कि उसके व्यापार और तस्करी से अरबों डॉलर की कमाई हुई। उसी रकम से देश की अर्थव्यवस्था को चलाने का जैसे-तसे जुगाड़ किया गया। इस बार भी कमोबेश तालिबानी शासकों के पास अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए न कोई सरकारी खजाने में अकूत संपत्ति बची है और ना ही तालिबानियों के पास कोई बेहतरीन अर्थशास्त्री। ऐसे में विदेशी मामलों के जानकारों का पूरा अनुमान है कि तालिबान इस बार फिर से न सिर्फ अफीम को बेचकर और उसकी तस्करी करवा कर अपने देश की अर्थव्यवस्था चलाएगा बल्कि इससे नार्को टेररिज्म को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

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अफगानिस्तान के सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक पूरे देश से हर साल तकरीबन 25 हजार करोड़ रुपये की अफीम का निर्यात किया जाता है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर राजमणि जैन कहते हैं हकीकत में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को यही अफीम आगे बढ़ाती है। क्योंकि अफगानिस्तान में पूरे अफीम के कारोबार के सत्तर फीसदी हिस्से पर तालिबान का ही दबदबा कायम था। अब तो तालिबान सत्ता पर काबिज है इसलिए खुलेआम अफीम का कारोबार सरकारी तौर पर किया जाएगा। डॉक्टर जैन कहते हैं कि तालिबानियों के पास पहले भी सत्ता चलाने का कोई अनुभव नहीं था और इस बार भी आने वाली तस्वीरों से इसी बात का अंदाजा लगाया जा रहा है। देश को आगे चलाने के लिए बजट की जरूरत होती है और अफगानिस्तान के सरकारी खजाने में न तो इतना बजट है और न ही तालिबान जैसे अनुभवहीन लड़ाकों के पास कोई रोड मैप है। ऐसे में अर्थव्यवस्था की मजबूती का रास्ता सिर्फ अफीम की खेती से उसकी तस्करी और फिर नार्को टेररिज्म तक जाता है।

अफगानिस्तान के सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक 1978 से लेकर 1992 के बीच अफीम का उत्पादन बढ़ना शुरू हुआ। इसके लिए सरकारी महकमे ने बहुत प्रयास किए। अफगानिस्तान और आसपास के मुल्कों के जानकार विशेषज्ञों का कहना है किसानों को इससे फायदा होना शुरू हुआ, लेकिन अफगानिस्तान में मौजूद एक कबीलाई इलाके के लड़ाकों के लिए बड़ा वरदान साबित हुआ। अफीम की पैदावार से मिलने वाली रकम को इन कबीलाई लोगों ने अपने संगठन तालिबान को मजबूत करने के लिए न सिर्फ हथियार खरीदने शुरू किए, बल्कि इसकी दुनियाभर में तस्करी भी करनी शुरू कर दी।

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भारत में नार्को मामले के विशेषज्ञ और महाराष्ट्र कैडर के पूर्व आईपीएस आरएम जगादले कहते हैं यही वह दौर था जब धीरे-धीरे अफगानिस्तान ने पूरी दुनिया में तालिबानियों के एक इंटरनेशनल संगठित गिरोह के माध्यम से अफीम, हशीश और हेरोइन जैसे अन्य मादक पदार्थों की तस्करी करनी शुरू कर दी। इससे होने वाली आय से तालिबानियों ने अपने संगठन को मजबूत करना शुरू कर दिया और नार्को टेररिज्म को बढ़ावा मिलने लगा। पूर्व आईपीएस कहते हैं इस बार फिर अफगानिस्तान में तालिबानियों के काबिज होने के बाद नार्को टेररिज्म बढ़ने की पूरी संभावनाएं दिख रही हैं। क्योंकि दुनियाभर के बड़े-बड़े ड्रग पैडलर अफगानिस्तान में तालिबानियों के संपर्क में रहते हैं।

विदेशी मामलों के विशेषज्ञ एएन बहेरा कहते हैं कि तालिबान के पहले शासनकाल और अब के हालातों में बहुत अंतर है। तालिबान को दुनिया स्वीकार करती है या नहीं यह बात अलग है, लेकिन अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए इस वक्त जो भी सरकार या संगठन वहां पर हो, उसे अपने संसाधनों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। वह कहते हैं अफगानिस्तान में बीते कई दशकों से पश्चिमी देशों सहित दुनिया के सभी बड़े मुल्क आर्थिक तौर पर अफगानिस्तान की मदद करते आए हैं। अगर वही मदद अफगानिस्तान को चाहिए तो उसके लिए तालिबान को अपना रवैया बेहद लोकतांत्रिक रखना होगा। विशेषज्ञों का कहना है अफगानिस्तान के लिए ऐसा संभव नहीं है। क्योंकि जिस शरीयत (इस्लामिक कानून) कानून से अफगानिस्तान में सत्ता चलाना चाहते हैं उसे दुनिया के बड़े गैर मुस्लिम देश स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे में अफगानिस्तान में काबिज तालिबान की सत्ता विदेशी मदद की हकदार होगी, इस पर संशय बरकरार है।
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नशे के कारोबार पर नजर रखने के लिए नारकोटिक्स विभाग के एक आईपीएस अधिकारी बताते हैं कि पकड़े गए कई अफगानी और नाइजीरिया के ड्रग पैडलर ने इस बात का खुलासा किया कि योजनाबद्ध तरीके से अफगानिस्तान के तालिबानी गैर-मुस्लिम देशों में नशे के कारोबार को बढ़ावा देते हैं। नारकोटिक्स विभाग से जुड़े आईपीएस अधिकारी का कहना है तालिबानियों की सोची समझी रणनीति नार्को टेररिज्म को भी बढ़ावा देती है। वह कहते कि तालिबानियों की अफगान में आई सत्ता से दुनिया के सभी मुल्कों को बहुत अलर्ट हो जाना चाहिए। क्योंकि अब नार्को टेररिज्म इसी के साथ बढ़ना शुरू हो जाएगा।

विदेशी मामलों के जानकार बहेरा का कहना है कि अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए चीन जैसे कई मुल्क तैयार बैठे हैं। जबकि रूस और अमेरिका भी कुछ शर्तों के साथ तालिबान की सत्ता को पिछले दरवाजे से और खुलकर मदद करने को तैयार हैं। ऐसे में तालिबानी सत्ता के पास मदद के दरवाजे तो खुले हैं, लेकिन उस मदद के बदले उनको क्या खोना होगा और क्या पाना होगा। इस बात का आकलन तालिबानी लड़ाकों को ही करना है। क्योंकि तालिबानी किसी तरीके से अपनी जमीन पर दूसरे मुल्कों पनपने नहीं देना चाहेंगे। इसलिए चीन की खुली मदद के लिए तालिबान कभी हां नहीं करेंगे। तालिबान को बहुत करीब से समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबानियों को इस बात का पूरा अंदाजा है कि चीन अगर उनको मदद करेगा, तो उनकी जमीन का इस्तेमाल भी करेगा। और जमीन के इस्तेमाल से कहीं चीन उन पर हावी ना हो जाए इसलिए रणनीतिक तरीके से चीन की हर मदद को तालिबान हां करने से परहेज करेगा। वहीं दूसरी तरफ आर्थिक मदद के लिए एक बात पूरी तरीके से तय है कि अगर तालिबानी अपने अड़ियल रुख पर अड़े रहे तो समूचे विश्व से मिलने वाली आर्थिक मदद न सिर्फ रुकेगी, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था भी पूरी तरीके से चौपट हो जाएगी।
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