खराब तो खराब है, अच्छा कैसे कह सकते हैं?
पिछले साल रिटायर हुए विदेश सेवा के एक अधिकारी तालिबान के बारे में पूछने पर कहते हैं कि संत लोगों का संगठन तो है नहीं। फिर खराब को अच्छा कैसे कहा जा सकता है? रिसर्च एंड एनालिसिस विंग को सेवाएं दे चुके पूर्व मेजर जनरल कहते हैं कि तालिबान का हमेशा मकसद दारुल इस्लाम की स्थापना, इस्लामिक कानून के आधार पर कट्टर शासन रहा है। सुन्नी मुसलमानों का प्रभाव रहता है। उसके लिए मजहबी प्रावधान ही अहम हैं। सूत्र का कहना है कि कंधार विमान अपहरण कांड को हम इतनी जल्दी क्यों भूल जाते हैं?
इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि संकेत बहुत अच्छे नहीं हैं। क्योंकि अफगानिस्तान हजारा कम्युनिटी हो या दोस्तम, हिकमतयार का गुट हो सब पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुके हैं। नॉदर्न अलायंस जैसे तालिबानी संगठन को जवाब देने वाले संगठन कहां हैं? वह एक बात और जोड़ते हैं। कहते हैं कि तालिबान से चीन और रूस सॉफ्ट कॉर्नर रखकर चल रहे हैं। यह तो तालिबान के लिए फायदे की बात है। यही पाकिस्तान के लिए भी फायदे की बात है। तालिबान के लिए भी फायदे की बात है कि उसे विश्व के कुछ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर की क्षमता रखने वाले देश मान्यता देने का लगातार संकेत दे रहे हैं, और यह हमारे लिए थोड़ा चिंता की गुंजाइश छोड़ती है।
अमेरिका में भी तालिबान का खौफ है
न्यू जर्सी में नीलेश सिंह रहते हैं। बताते हैं अफगानिस्तान में तालिबान के आने की खबर और खौफ दोनों अमेरिका में है। चर्चा के दौरान उनके अमेरिका के सहयोगी इसे अच्छा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि इससे इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरता को बढ़ावा मिल सकता है। आईएसआईएस या अल-कायदा जैसे संगठन आने वाले समय में परेशानी खड़ी कर सकते हैं। नीलेश सिंह पॉलिसी रिसर्च एंड डिप्लोमेसी से जुड़े विषय पर अध्ययन करने के बाद पिछले 15 सालों से अमेरिका में हैं। वह कहते हैं कि पहले पाकिस्तान के आतंकवाद से भारत को सावधान रहना पड़ता था। क्या पता आने वाले समय में उसकी चुनौती बढ़ जाए। नीलेश सिंह बताते हैं कि अमेरिका में लोगों को राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा बिना स्थिति की समीक्षा किए और अचानक लिया गया निर्णय कम रास आ रहा है। लोगों में भी यही चर्चा है कि अमेरिका अफगानिस्तान में हार कर भाग गया। दूसरी तरफ यूरोप में भी तालिबान को लेकर अलग तरह की चिंता है।
कश्मीर का राग क्यों अलाप रहे हैं लोग?
रक्षा और विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि इस समय पूरी दुनिया में एक अजीब सी हवा बह रही है। हमारे यहां भी जरूरत से ज्यादा हिन्दू-मुसलमान हो रहा है। रंजीत कुमार कहते हैं कि आप तालिबान के पिछले कार्यकाल को केंद्र में रखकर मत सोचिए। समय के साथ तालिबान, उसकी योजना, रणनीति में कुछ तो बदलाव आएगा ही। बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका की फौज के अफगानिस्तान में उतरने से पहले पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों से तालिबान का कोई बहुत गंभीर रिश्ते का संकेत नहीं था। अब इस तरह के संकेत मिल रहे हैं। तालिबान जब सत्ता में नहीं था, तब कई आतंकी संगठनों ने उसकी मदद की होगी। इसी आशंका के कारण लोग अफगानिस्तान में एक सरकार के स्थान पर तालिबान के शासन को लेकर चिंतित हो रहे हैं। एसके शर्मा कहते हैं कि इतनी चिंता करनी चाहिए और भविष्य को ध्यान में रखकर उपाय भी किए जाने चाहिए।