मेरा जन्म पाकिस्तान में हुआ। जब मैं 6 साल का था, बंटवारा हो गया। हमारा परिवार दिल्ली के कश्मीरी गेट में आकर रहने लगा। पाकिस्तान में हमारा एक रेस्तरां था, जिसमें हम ताला लगा आए थे। जब दिल्ली आए तो यह भी इत्तेफाक था कि यहां हमें एक रेस्त्ररां मालिक मिले, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान जा रहे थे।
चूंकि हमारा पाकिस्तान में रेस्तरां था, इसलिए हम दोनों परिवारों ने तय किया कि हम अपने रेस्तरां आपस में बदल लेते हैं। हमने एक-दूसरे के साथ रेस्तरां की चाबी बदल ली। क्या आज कोई इस बात पर यकीन करेगा कि ऐसा भी हो सकता है? लेकिन वह भी एक जमाना था इस दिल्ली का। इस तरह दिल्ली में हमारा अपना रेस्तरांं हो गया, जिसका नाम था 'कार्लटन कैफे'।
हमारे कैफे की खासियत यह थी कि यहां मुगलई खाने के साथ-साथ बार भी था। शराब और कबाब की यह जुगलबंदी शायरों को बहुत पसंद आती थी, इसलिए दिल्ली के बड़े-बड़े शायरों और साहित्यकारों के लिए हमारा कैफे ऐसा अड्डा बन गया था।
वहां वे लोग आकर बैठते खाते-पीते और मौसिकी की महफिलें जमती। एसएस ठाकुर, किशन चंदर, शाहिर होशियारपुरी, मजान, साहिर लुधियानवी जैसे दिल्ली के कई बड़े-बड़े शायर और लेखक हमारे कैफे में आया करते थे। काफी लंबे समय तक यह कैफे चला, फिर वह बंद हो गया। उस समय दिल्ली में फास्ट फूड का चलन नहीं था। दिल्ली में दिल्ली का ही खाना मिलता था। पुरानी दिल्ली का पूरा इलाका अपने खाने-पीने के लिए प्रसिद्ध था। यहां की चाट, परांठे, कचौड़ी, बेडमी, आलू की सब्जी, राजभोज, दूध-जलेबियां, कुल्फी फलूदा और जाने क्या-क्या।
इन सबके बारे में आज भी सोचता हूं तो मन ललचा जाता है। दिल्ली के खाने में एक और बहुत पुरानी आइटम है मटर-कुलचे, जो कि छोटे-छोटे खोमचों व साइकिल पर चलने वाली दुकानों पर आज भी मिल जाते हैं। कई दुकानदारों ने कुलचों के साथ परांठे देने शुरू कर दिए हैं। मुझे मटर, कुलचों के साथ ही अच्छा लगता है, इसलिए आज भी मुझे कहीं मटर-कुलचा वाला दिख जाए तो मैं खुद को रोक नहीं पाता।
इतने सालों में अपने खानपान में दिल्ली ने बहुत तरक्की की है। पूरे भारत में दिल्ली जैसा खाना नहीं मिलता। यहां दिल्ली के खाने के साथ-साथ साउथ इंडियन राजस्थानी से लेकर आप जिस भी राज्य का नाम ले लें, पूरे भारत का अच्छा खाना आपको दिल्ली में मिल जाएगा। पिछले कुछ सालों में दिल्ली के बाकी इलाकों में फ्यूजन फूड ज्यादा बढ़ा है। विदेशी खानपान भी आया है।
मैंने अपनी पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल (बाराखंबा रोड) से की। उस समय की दिल्ली आज जैसी नहीं थी। कनॉट प्लेस हमारा घूमने का अड्डा हुआ करता था। दिल्ली की जनसंख्या कम थी। आने-जाने के लिए लोग साइकिलों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन उसके बाद दिल्ली में तेजी से लोगों ने आना और यहीं बसना शुरू कर दिया।
जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, दिल्ली का आकार भी बढ़ता चला गया। आज जैसी दिल्ली दिखती है, वैसी पहले बिल्कुल नहीं थी। आज बेशक जनसंख्या बहुत बढ़ गई है, लेकिन दिल्ली तो दिल्ली है। लंबी-चौड़ी सड़कें, खूब सारे पेड़ और हरियाली, बड़े-बड़े पार्क व तमाम सुविधाएं। यही वजह है कि मेरा मुंबई जाकर दम घुटने लगता है।