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Assam: दर्द भरे 20 साल, हर स्वतंत्रता दिवस इनके लिए लाता है मायूसी, धेमाजी विस्फोट मामले में अब SC से उम्मीद

Wed, 14 Aug 2024 06:17 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धेमाजी

सार

2004 में असम के धेमाजी शहर में स्वतंत्रता दिवस पर परेड मैदान में झंडारोहण समारोह के दौरान हुए विस्फोट में तीन बच्चों सहित 12 लोगों की मौत हो गई थी। मामले में पीड़ित परिवारों को अब तक न्याय नहीं मिल सका है। उनको उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से इन्साफ मिलेगा। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हर साल स्वतंत्रता दिवस आता है। चारों ओर आजादी का जश्न मनाया जाता है। भारत के आजाद होने की शुभकामनाएं होती हैं और देशभक्ति के तराने होते हैं। मगर असम के धेमाजी के कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जिनके लिए बीते 20 साल से स्वतंत्रता दिवस केवल मायूसी और दर्द लेकर आता है। हर साल वे उम्मीद लगाते हैं कि इस बार स्वतंत्रता दिवस वह अपनों को न्याय दिलाकर मनाएंगे, लेकिन कुछ नहीं होता। अब एक बार फिर धेमाजी विस्फोट में जान गंवाने वालों के परिवारों में उम्मीद जगी है। वे कहते हैं कि दोषियों को सजा न मिलने की टीस है, लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है तो उनको न्याय जरूर मिलेगा।

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दरअसल 2004 में असम के धेमाजी शहर में स्वतंत्रता दिवस पर परेड मैदान में झंडारोहण समारोह के दौरान हुए विस्फोट में तीन बच्चों सहित 12 लोगों की मौत हो गई थी। इस विस्फोट की जिम्मेदारी यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) संगठन ने ली थी। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और छह आरोपियों को गिरफ्तार किया। जिला और सत्र अदालत ने 2019 में मामले में चार आरोपियों को आजीवन कारावास और दो अन्य को चार साल जेल की सजा सुनाई थी। मगर इनको सबूतों के अभाव में पिछले साल हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। बस इसके बाद अपनों के लिए न्याय का इंतजार कर रहे परिवारों की उम्मीद टूट गई। मगर पिछले दिनों असम सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की बात कही तो एक बार फिर उम्मीदें बंध गईं हैं। 
 
इस विस्फोट में अपनों को खोने का दर्द सेवानिवृत्त शिक्षिका शांति गोगोई भी झेल रही हैं। शांति ने विस्फोट में अपनी गर्भवती बहू और उसके अजन्मे बच्चे को खो दिया। वे दोनों को न्याय दिलाने के लिए चौखट दर चौखट भटक रही हैं। अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शांति गोगोई को कुछ उम्मीद बंधी है। वहीं न्याय मिलने में हुई देरी को लेकर गोगोई सवाल उठाती हैं कि सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में हुए बम धमाकों के बाद अब तक पुलिस को कोई भी गवाह नहीं मिला जो बता सके कि विस्फोटक किसने लगाए या इसके पीछे कौन था? 
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गोगोई के ही पड़ोसी नित्यानंद सैकिया और अन्य पीड़ितों के परिवार भी न्याय न मिलने से मायूस हैं। उनकी आखिरी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से है, जो उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली असम सरकार द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहा है। विस्फोट में अपनी दो बहनों को खोने वाले सैकिया कहते हैं कि हाईकोर्ट के आदेश की समीक्षा करने की जरूरत है। उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय हमें न्याय देगा। उन्होंने कहा कि हमें एक पत्र मिला है। इसमें बताया गया है कि राज्य सरकार इस मामले को शीर्ष अदालत में उठाएगी। 

पुलिस कार्रवाई को लेकर सैकिया ने दावा किया कि घटना के वक्त बम डिटेक्टरों ने काम नहीं किया। पुलिस ने कई खामियों के साथ एक आरोपपत्र दाखिल किया। जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। उन्होंने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) पर भी सवाल उठाया। जिसने पहले घटना में शामिल होने से इन्कार किया और बाद में घटना के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी थी। सैकिया कहते हैं कि उल्फा ने निर्दोषों का खून बहा दिया। यह उन्होंने किसलिए किया? 

दरअसल, विस्फोट के एक दिन बाद उल्फा के तत्कालीन अध्यक्ष अरबिंद राजखोवा ने एक बयान में कहा था कि सुरक्षा बलों ने संगठन के बहिष्कार के आह्वान को अस्वीकार करने के लिए स्कूली बच्चों को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया था। वहीं 2009 में संगठन के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ ने सार्वजनिक माफी मांगी थी और दावा किया था कि उन्हें कुछ कैडरों द्वारा गुमराह किया गया था। उन्हें घटना में संगठन की भागीदारी से इन्कार करने के लिए मजबूर किया गया था।
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