हरी इलायची तीन माह में 50 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंची
काली इलायची 2500 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही
चाय, मिठाइयों और खास व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिए होता है इस्तेमाल
विशेषज्ञ की राय, उत्पादन में कमी और जलवायु परिवर्तन से बढ़ीं कीमतें
विजय कपिला
बड़ूही (ऊना)। सब्जी और फलों के बाद अब मसालों की कीमत भी बेकाबू होती नजर आ रही है। हरी और काली इलायची की कीमतों में अचानक आया उछाल आम उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर डाल रहा है। हरी इलायची जनवरी में 10 रुपये प्रति 10 ग्राम के हिसाब से बिक रही थी, अब 50 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गई है। वहीं काली इलायची, जिसकी कीमत पहले लगभग 1000 रुपये प्रति किलो हुआ करती थी, अब 2500 रुपये प्रति किलो के आसपास बिक रही है। मसालों की इस महंगाई ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। इलायची जैसे खास मसाले जो चाय, मिठाइयों और खास व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। दाम बढ़ने के कारण उपभोक्ताओं की खरीदने में रुचि कम हो गई है। छोटी इलायची के केरल और तमिलनाडु राज्य प्रमुख उत्पादक हैं। इसके साथ कर्नाटक में भी छोटी इलायची की खेती की जाती है। सिक्किम बड़ी इलायची का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में भी बड़ी इलायची की खेती की जाती है। अरुणाचल प्रदेश में भी बड़ी इलायची की खेती की जाती है। इन राज्यों में इलायची की खेती के लिए अनुकूल जलवायु और मिट्टी की स्थिति होती है, जो इलायची के उत्पादन में मदद करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन में कमी जलवायु परिवर्तन, बारिश का न होना और बढ़ती लेबर कीमतें बढ़ने का प्रमुख कारण है।
बाक्स
महंगाई के चलते उपभोक्ताओं को अब कम मात्रा में मसाले खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कुछ लोग तो सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं, जिससे पारंपरिक स्वाद और खुशबू में भी कमी देखने को मिल रही है। -बड़ूही के दुकानदार संसार चंद
इलायची के दाम बढ़ने से दुकानदार का बजट भी खराब हो रहा है। अब दुकान में स्टॉक मंगवाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च हो रहे हैं। -दुकानदार सतीश मेहता
बाक्स
सरकार मसालों की कीमतों पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए, ताकि आम जनता की रसोई फिर से महक सके और त्योहारों या खास मौकों पर पारंपरिक जायके से समझौता न करना पड़े। -बेहड कांशी के अजय शर्मा
बाक्स
ज़ब से हरी और काली इलायची के दाम बड़े है, हमने बाजार से खरीदना कम कर दिया। आय कम है और महंगाई ज्यादा हो गई है। इसलिए कंजूसी से गुजारा करना पड़ता है। -टकारला से गृहिणी अरुण बाला