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तकनीक: पानी के स्तर से पता चलेगी ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार, केंद्रीय सर्वर पर पहुंचेगा रियल टाइम डाटा

Wed, 21 Oct 2026 05:30 AM IST
Krishan Singh कमलेश रतन भारद्वाज, संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर।

सार

 केंद्रीय भूजल बोर्ड ने हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिले में 20 स्थानों पर मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित करने का काम शुरू कर दिया है। इन उपकरणों के माध्यम से जुटाया गया रियल टाइम डाटा केंद्रीय सर्वर तक पहुंचेगा, जहां वैज्ञानिक इसका विश्लेषण कर सकेंगे।
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पानी के स्तर से पता चलेगी ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले बदलावों का आकलन अब भूजल स्तर, तापमान और पानी के बहाव से जुड़े आंकड़ों के आधार पर भी किया जाएगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड ने हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिले में 20 स्थानों पर मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित करने का काम शुरू कर दिया है। इन उपकरणों के माध्यम से जुटाया गया रियल टाइम डाटा केंद्रीय सर्वर तक पहुंचेगा, जहां वैज्ञानिक इसका विश्लेषण कर सकेंगे। ग्लेशियरों और उनसे बनने वाली झीलों की निगरानी पहले से की जा रही है। अब भूजल निगरानी को इस व्यवस्था से जोड़कर हिमालयी क्षेत्रों में जल संसाधनों में होने वाले बदलावों को बेहतर ढंग से समझने की दिशा में काम किया जा रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाला पानी नदियों के बहाव के साथ जमीन के भीतर जलस्तर को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भूजल स्तर, तापमान और पानी के दबाव में होने वाले बदलावों का अध्ययन वैज्ञानिकों को क्षेत्र के जल चक्र को समझने में मदद करेगा।

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डिजिटल रिकॉर्डर से दर्ज होंगे बदलाव
मॉनिटरिंग सिस्टम में डिजिटल वॉटर लेवल रिकॉर्डर और पीजोमीटर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। बोरहोल में लगाए जाने वाले सेंसर पानी के दबाव को मापकर भूजल स्तर में होने वाले बदलावों की जानकारी देंगे। टेलीमेट्री सिस्टम की मदद से यह डाटा मोबाइल नेटवर्क या अन्य संचार माध्यमों के जरिए केंद्रीय सर्वर तक भेजा जा सकेगा। इसके लिए जमीन की प्रकृति के अनुसार 60 से 100 मीटर तक ड्रिलिंग कर उपकरण स्थापित किए जाएंगे। बोरहोल लॉगिंग के माध्यम से जमीन के नीचे चट्टानों और मिट्टी की परतों की जानकारी भी जुटाई जाएगी।
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घेपन घाट में स्थापित है अर्ली वार्निंग सिस्टम
लाहौल-स्पीति की घेपन घाट ग्लेशियर झील पर अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा चुका है। इसके माध्यम से झील के जलस्तर और मौसम में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जाती है। असामान्य स्थिति में संबंधित अधिकारियों और जिला प्रशासन को समय रहते अलर्ट भेजने की व्यवस्था है।

आधुनिक तकनीक की मदद से यह कार्य किया जा रहा है। एकत्रित डाटा संबंधित विभागों, प्रशासन और एजेंसियों के साथ साझा किया जाएगा। जमीन की प्रकृति के अनुसार 60 से 100 मीटर तक ड्रिलिंग कर मॉनिटरिंग सिस्टम स्थापित किए जाएंगे। -डॉ. संजय पांडे, वैज्ञानिक, केंद्रीय भूजल बोर्ड, नॉर्दर्न हिमालयन रीजन, धर्मशाला

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