पश्मी में दो करोड़ की लागत से बनाया गया है महाराज का मंदिर
70 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद 14 दिसंबर को पहुंचेंगे पश्मी
संवाद न्यूज एजेंसी
शिलाई (सिरमौर)। हिमाचल प्रदेश के शिलाई क्षेत्र के इतिहास में इस वर्ष दिसंबर में एक ऐतिहासिक धार्मिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल दोनों राज्यों में आस्था के प्रतीक और न्याय के देवता माने जाने वाले छत्रधारी चालदा महासू महाराज पहली बार उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र से सिरमौर के शिलाई क्षेत्र के गांव पश्मी में पधारने वाले हैं।
देव यात्रा का सबसे खास पहलू यह है कि महाराज इस बार लगभग 70 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा करते हुए दसऊ गांव से टौंस नदी पार कर हिमाचल में प्रवेश करेंगे। देवता 13 दिसंबर को मीनस पुल पहुंचकर हिमाचल की सीमा में कदम रखेंगे और द्राबिल गांव में रात्रि विश्राम करेंगे। अगले दिन 14 दिसंबर को पश्मी गांव पहुंचकर नवनिर्मित महासू मंदिर में विराजमान होंगे।
महासू मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए पश्मी और घासन गांव के लोगों ने मिलकर लगभग दो करोड़ रुपये का विशाल कार्य पूरा किया है। पश्मी गांव के 45 परिवारों और घासन के 15 परिवारों ने इस धार्मिक परियोजना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मंदिर की ध्वज प्रतिष्ठा पहले हो गई थी, लेकिन कपाट 14 दिसंबर को देवता के आगमन के बाद ही खोले जाएंगे।
देव प्रवास को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के लिए श्री महासू महाराज कमेटी गठित की गई है। कमेटी में दिनेश चौहान को बजीर, रघुवीर सिंह को भंडारी और पंडित आत्माराम शर्मा को मुख्य पुजारी की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
पश्मी गांव में महासू महाराज के आगमन की नींव पांच वर्ष पूर्व पड़ गई थी। वर्ष 2020 में लॉकडाउन के दौरान जौनसार के दसऊ गांव से एक विशाल बकरा (घांडुवा) अचानक पश्मी में आकर ठहर गया। दो वर्षों तक ग्रामीण उसे एक साधारण पशु मानते रहे, लेकिन 2022 में देव वक्ता द्वारा स्पष्ट किया गया कि यह वास्तव में देवता का देवदूत है। एक संकेत जो देव प्रवास से पहले भेजा जाता है। पहचान होने के बाद यह बकरा पूरी तरह शांत और सौम्य हो गया, जिसे अब देवी-देवताओं के प्रतीक रूप में सम्मान दिया जा रहा है।
चालदा महासू के पधारने पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं के उमड़ने की उम्मीद है। देव यात्रा के चलते पश्मी गांव में त्योहार जैसा माहौल है। घर-घर में सजावट, दीपमालाएं और देव ध्वज लहराते दिखाई दे रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल धार्मिक अवसर नहीं बल्कि पीढि़यों के बाद मिलने वाला सांस्कृतिक सौभाग्य है। हिमाचल की धरती पर चालदा महासू महाराज का यह पहला आगमन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दोनों प्रदेशों की सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाला अभूतपूर्व अवसर माना जा रहा है।