मकान के नुकसान का आकलन 28.22 लाख था
प्रार्थी का आरोप है कि हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग ने तकनीकी मूल्यांकन के बाद उनके मकान के नुकसान का आकलन 28.22 लाख रुपये किया था। लेकिन एनएचएआई ने इसे मनमाने ढंग से घटाकर महज 5.49 लाख रुपये कर दिया जो मरम्मत के लिए नाकाफी है। मकान की वास्तविक बाजार कीमत लगभग 44.78 लाख रुपये है। मकान असुरक्षित होने के कारण उनके किरायेदारों ने घर खाली कर दिया जिससे उन्हें पिछले दो वर्षों में करीब 12 लाख रुपये के किराये का नुकसान 50 हजार रुपये प्रतिमाह हुआ है। प्रार्थी का आरोप है कि कंपनी की ओर से बिना किसी अधिग्रहण के उनकी निजी जमीन पर निर्माण का मलबा फेंक दिया है। साथ ही गांव के लोगों के लिए रास्ता न बनाए जाने के कारण सैकड़ों लोग उनके घर के आगे की निजी जमीन का इस्तेमाल रास्ते के तौर पर कर रहे हैं। अदालत ने इन सभी मुद्दों को संज्ञान में लेते हुए एनएचएआई को जवाब दाखिल करने की मोहलत दी है। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।
दूसरे मामले में 1.11 करोड़ रुपये जमा
एक अन्य मामले में अदालत के आदेशानुसार रजिस्ट्री ने सूचित किया कि एनएचएआई की ओर से 5 अगस्त 2026 के अदालती आदेशों का पालन करते हुए 1,11,77,962 रुपये (1.11 करोड़ रुपये) की राशि जमा कर दी है। यह राशि क्षतिपूर्ति के रूप में तय की गई कुल राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा है। अदालत ने प्रतिवादी ठेकेदार कंपनी को निर्देश दिया है कि वह भी अपने हिस्से की राशि आगामी सुनवाई की तिथि तक अनिवार्य रूप से जमा करवाए। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया कि प्रभावित रंजना देवी की ओर से कोई उपस्थित नहीं था लेकिन उन्होंने समान राहत के लिए एक अलग याचिका दायर की है। अदालत ने प्रशासनिक कार्यालय को दोनों याचिकाओं को एक साथ करने के आदेश दिए हैं। राज्य सरकार ने पीठ को अवगत कराया कि 5 अगस्त 2026 के आदेश के अनुपालन में प्रभावित चंदा देवी के मकान के मूल्य का आकलन कर लिया है। अदालत ने कार्यालय को इस संबंध में दायर हलफनामे को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया।