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मान्यता : भस्मासुर से बचने के लिए देवढांक गुफा से श्रीखंड पहुंचे थे महादेव

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महाशिवरात्रि पर भोले के जयकारों से गूंजेगा देवढांक, हर वर्ष उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु
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महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर विभिन्न जिलों से दर्शन के लिए आते हैं शिवभक्त
तिलक राज कायथ
रामपुर बुशहर। हिमाचल प्रदेश देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां अनेक देवी-देवताओं का वास है। कुल्लू के निरमंड में भी भगवान शिव का पावन स्थान है, देवढांक। यहां हर वर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर हजारों शिवभक्तों का तांता लगता है। शुक्रवार को भी यहां हजारों शिव भक्त पहुंचकर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। रामपुर से 13 किलोमीटर दूर स्थित देवढांक गुफा में भगवान शिव दर्शन के लिए हर वर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर्व पर यहां सुबह 4:00 बजे से ही शिव भक्तों की कतारें लग जाती हैं और दिन भर दर्शनों का सिलसिला चला रहता है। कुल्लू, किन्नौर, मंडी और शिमला जिले से हर वर्ष यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि, जो श्रद्धालु यहां भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देवढांक गुफा में महादेव पूरे परिवार सहित विराजमान हैं। देवढांक गुफा चट्टानों के मध्य स्थित है। इस गुफा में आदिकाल से प्राकृतिक रूप से भगवान शिव लिंग रूप में विद्यमान है। इसके ऊपर स्वत: जल की धारा टपकती रहती है। मान्यता है कि अधर्मी व्यक्ति यहां निर्मित प्राकृतिक गुफा के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
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इनसेट
भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव ने देवढांक में ली थी शरण

जनश्रुति के मुताबिक निरमंड क्षेत्र में भस्मासुर राक्षस ने तपस्या करने के बाद भगवान शिव को प्रसन्न कर वरदान हासिल किया था कि वह जिस किसी के सिर पर भी हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। वरदान मिलने के बाद भस्मासुर ने भगवान भोलेनाथ के सिर पर हाथ रखना चाहा, तो भोलेनाथ ने राक्षस से बचाव करते हुए देवढांक गुफा में शरण ली। देवढांक गुफा से एक सूक्ष्म मार्ग के जरिए भगवान शिव श्रीखंड पहुंचे। यहां फिर भस्मासुर राक्षस को भगवान की ही एक लीला के बाद स्वयं भस्म करवाकर मार दिया गया। मंदिर में महाशिवरात्रि से पूर्व संध्या में निरमंड और आसपास के क्षेत्रों से हजारों लोग जुटते हैं। यहां रातभर भगवान शिव की स्तुति की जाती है। सुबह 4:00 बजे से मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू हो जाती है। घंटों इंतजार के बाद श्रद्धालुओं को भगवान शिव के दर्शन होते हैं। श्रद्धालु दूध, जल के पात्र, बिल्वपत्र, बड़, बेर और फल चढ़ाकर भोले की जयकारों के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर से कुछ ही दूरी पर नंदी महाराज विराजमान हैं। भगवान शंकर के दर्शन के बाद श्रद्धालु यहां नंदी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भोले के भक्त यहां घोटे का प्रसाद बांटते हैं, जिसे पीकर भक्त मदमस्त होकर बम-बम भोले के जयकारे लगाते हैं। देवढांक मंदिर कमेटी के मुख्य संयोजक टेक भंडारी ने बताया कि वीरवार रात को मंदिर में आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे लोग जागरण और भगवान शिव की स्तुति करेंगे। शुक्रवार सुबह चार बजे श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के कपाट खोले जाएंगे और रात नौ बजे तक दर्शनों कर सकेंगे। मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को साबुदाने का प्रसाद मंदिर कमेटी द्वारा दिया जाएगा।
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