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Rampur Bushahar News: भुंडा महायज्ञ में ही बाहर निकलते हैं भगवान परशुराम

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महाभारत के युद्ध के समय आए थे निरमंड, माता अंबिका का मंदिर किया था स्थापित
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हजारों वर्ष पुराना है भगवान परशुराम के मंदिर का इतिहास, मुख्य द्वार से ही की जाती है पूजा

हरिकृष्ण शर्मा

निरमंड (कुल्लू)। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध कुल्लू जिले के निरमंड उपमंडल में भगवान परशुराम ने हजारों साल पूर्व तपस्या की है। यहां भगवान परशुराम का अति प्राचीन मंदिर भी है। इसके मुख्य द्वार पर ही भगवान हिरण्यगर्भ की अति प्राचीन मूर्ति स्थापित है, जिसे यहां के लोग शुस्त्रोक्त भगवान विष्णु से जोड़ते हैं। इसमें सृष्टि के पांच तत्व वर्णित है। भगवान परशुराम यहां सात द्वार के अंदर गर्भगृह में विराजमान हैं, जो माता अंबिका के आदेशों के बाद ही भुंडायज्ञ के लिए बाहर निकलते हैं। भगवान परशुराम की पूजा मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर से ही प्रतिदिन होती है। माता अंबिका के कारदार पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि चार दशक पूर्व 1982 को निरमंड में भुंडायज्ञ हुआ था। इसमें भगवान परशुराम के दर्शन हुए थे। अब माता अंबिका के आदेशों के बाद ही भुंडा यज्ञ होगा, तभी भगवान परशुराम के दर्शन हो सकेंगे।
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इनसेट

मंदिर में स्थापित दो कुंडों का रहस्य

भगवान परशुराम मंदिर के भीतर एक यज्ञशाला भी है, जो अति प्राचीन है। यज्ञशाला में दो कुंड बने हैं, जिसमें से एक कुंड के अंदर जब यज्ञ होता है, तो दूसरे कुंड स्वत: जल से भर जाता है। मान्यता है कि जब यज्ञ में हवन अग्नि अपने चरम सीमा पर होती है तो दूसरा कुंड पानी से भरता है, जो भगवान परशुराम का ही चमत्कार है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के समय भगवान परशुराम मंदराचल पर्वत से पलायन कर निरमंड आए। शास्त्र भी कहते हैं कि उन्होंने हिमाचल में 15 बस्तियां बसाई है। इसमें से अब पांच स्थान बचे हैं। जबकि शेष दस स्थान अपना इतिहास भूल चुके हैं। बचे पांच स्थानों में मंडी के दो काव और मुवेल, शिमला जिले में निरथ और दत्तनगर, जबकि कुल्लू में निरमंड स्थान हैं, जो भगवान परशुराम ने बसाया है। यहां आने से पूर्व भगवान परशुराम ने कुछ स्थानों पर क्षणिक ठहराव किया है। चार ठहराव में शिंगला, शनेरी, लालसा और डंसा स्थान शामिल है। महाभारत के युद्ध के पश्चात शांति की तलाश करने के लिए वे यहां आए। उन्होंने माता अंबिका की स्थापना कर उनकी अराधना की। भगवान परशुराम अपनी पूजा नहीं करवाते, बल्कि माता की पूजा करवाते हैं। माता अंबिका के कारदार पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि भगवान परशुराम द्वारा बसाई निरमंड नगरी का इतिहास हजारों साल पुराना है। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा दिया गया ताम्र पत्र आज भी हजारों सालों से उनके पास सुरक्षित हैं, जो ऐतिहासिक है।
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