आनी (कुल्लू)। श्रीखंड महादेव पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसी चायल वैली के दवाह गांव में बुधवार को ऐतिहासिक पड़ैई मेला धूमधाम से मनाया गया। यह मेला क्षेत्र का सबसे बड़ा और प्राचीन मेला माना जाता है। कहा जाता है कि पक्षीराज गरुड़ अमृत कलश को लेकर वायु मार्ग से हिमालय की ओर श्रीखंड की कंदराओं में पहुंचे तो ज्वदग्नपुरी क्षेत्र में कलश से अमृत की बूंदे गिरीं। इससे यहां के सभी देवताओं ने अमृत का रसपान किया।
मेला कमेटी के सदस्य दवाह निवासी रवि डोगरा और नोया राम ठाकुर और साहित्यकार भगवान प्रकाश ने बताया कि यह मेला हजारों साल पुराना है। यहां मां गौरा के काली रूप में भोज नृत्य किया जाता है। कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ, तब अमृत का कलश निकला था। ठीक उसी तरह एक मिट्टी से निर्मित कलश में घी डालकर जिसको यहां की भाषा में (कुंदणी) कहा जाता है। इसमें कलशधारी को स्वयं भगवान विष्णु का रूप माना जाता है और अग्नि मशाल, बिच्छू बूटी (कारल) को देवता का रूप माना जाता है जबकि पीने वालों को असुर का रूप माना जाता है। मान्यता है कि यह मेला पहले क्षेत्र के एक ही गांव दवाह में मनाया जाता था, जिससे एक गांव पर काफी बोझ पड़ रहा था।
इसको देखते हुए इसको 10 गांव में विभाजित किया गया। परंपरा के अनुसार हर गांव में एक साल परिक्रमा करने के बाद 10 साल बाद यह मेला आता है। मेले के प्रति क्षेत्रवासियों की गहरी आस्था है। क्षेत्र के अलावा दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों को भी इस मेले में शिरकत करते हैं। मेले में रिश्तेदारों को न्योता देकर बुलाया जाता है। इस दौरान वेशभूषा के साथ कुल्लवी लोकनृत्य का आयोजन भी किया गया।