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पड़ैई मेले दिखी परंपरा की झलक, लोकनृत्य से बांधा समा

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वैली के ढमार का ऐतिहासिक और पारंपरिक पडै़ई मेले में दिखी प्राचीन संस्कृति की झलक - फोटो : RAMPUR-HP
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आनी (कुल्लू)। निरमंड के चायल वैली के ढमार गांव का ऐतिहासिक पडै़ई मेला धूमधाम से मनाया गया। मेले का आयोजन देवता सुंदर नाग के सानिध्य में किया जाता है। मान्यता है कि यह क्षेत्र का सबसे बड़ा और प्राचीन मेला है।
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देवता सुंदर नाग मंदिर कमेटी के सदस्य संदेव ठाकुर ने बताया कि यह मेला हजारों साल से मनाया जाता है। मेले में मां गौरा के काली रूप में भोज नृत्य का आयोजन का किया जाता है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन हुआ था, तब अमृत का कलश निकला था। ठीक उसी तरह एक मिट्टी से निर्मित कलश में घी डालकर, जिसको स्थानीय बोली में (कुंदणी) कहा जाता है।
इसमें अमृत रूपी घी को कलश से पिलाया जाता है। इसे पिलाने वालों को वैष्णव विष्णु का रूप माना जाता है और पीने वालों को देव और असुर का रूप मानते हैं। यह मेला पहले क्षेत्र के एक ही गांव दवाह में मनाया जाता था। इससे एक गांव पर काफी बोझ पड़ रहा था। बाद में मेले को 10 गांव में विभाजित किया गया और परंपरा के अनुसार हर साल एक गांव में इसका आयोजन किया जाता है।
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जुआगी निवासी एलआर ठाकुर का कहना है कि मेले के प्रति क्षेत्रवासियों की गहरी आस्था है और क्षेत्र के दूर-दराज क्षेत्रों के लोग भी मेले में शिरकत करते हैं। मां चलासनी की उपस्थिति में हर 10 साल बाद हर एक गांव में इस मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में लोग नृत्य करते हैं।
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