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Minjar Mela 2025: बरसते सावन में विरह का राग है कुंजड़ी मल्हार, सात सांस्कृतिक संध्याओं में गाने की परंपरा

Sun, 03 Aug 2025 11:49 AM IST
अंकेश डोगरा पंकज सलारिया, संवाद न्यूज एजेंसी, चंबा

सार

Minjar Mela 2025: चंबा के अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्याओं में स्थानीय कलाकारों की ओर से गाए जाने वाले कुंजड़ी मल्हार का अपना महत्व है। चंबा वासी ऋतुकालीन, विरह और पारंपरिक लोक गीतों को कुंजड़ी मल्हार कहते हैं। पढ़ें पूरी खबर...
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कुंजड़ी मल्हार की प्रस्तुति देते अजीत भट्ट और साथी। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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कभी सोचा आपने कि सुबह से लेकर शाम को नीड़ तक लौटने वाले पंछी क्या-क्या गाते हैं? जाहिर है वे गाते हैं उमंग के गीत, कभी चिंता की धुनें और कभी विरह के राग...। चंबा वासी इन ऋतुकालीन, विरह और पारंपरिक लोक गीतों को कुंजड़ी मल्हार कहते हैं। एक बोल देखिए... ‘उड़ मेरी कुंजड़ी बरखां दिहाड़े, मेरे रामा जींदेया रे मेले... कुंजड़ी मल्हार गायन स्थानीय रीतों और सुरों का ऐसा संगम है, जिससे दर्शक या श्रोता भी पंछी ही हो जाते हैं।

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चंबा के अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्याओं में स्थानीय कलाकारों की ओर से गाए जाने वाले कुंजड़ी मल्हार का अपना महत्व है। मिंजर मेले में कुंजड़ी मल्हार गाने की परंपरा है। यह गायन चंबा निवासी सुविख्यात गायक स्व. प्रेम सिंह की देन है। उनके बाद उन्हीं के परिवार के सदस्य अजीत भट्ट भी विरासत को सहेज रहे हैं। अजीत भट्ट ने बताया कि पारंपरिक और ऋतुकालीन लोकगीतों में प्रसिद्ध कुंजड़ी मल्हार, घुरेई, होरी और बसंत लोकगीतों के संग्रहण में काफी मेहनत की। 2014 में उन्हें ‘ट्रेडिशनल आर्टिस्ट ऑफ द ईयर’ के उपविजेता, 2015 में हिमाचलश्री श्रेष्ठ कलाकार के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

विरासत को संभालने के 32 साल में कई बदलाव आए। उनके कई पुराने साथी किन्हीं कारणों से जहां दूर हो गए तो कई नए साथी आ गए। उन्होंने 25 साथियों को अपने साथ जोड़ा है। वहीं, वर्ष 2014 में तत्कालीन उपायुक्त एम सुधा के आदेश के तहत निशुल्क तीन हजार स्कूली बच्चों को भी कुंजड़ी मल्हार लोक गीतों को सिखाया गया। वर्तमान समय में अजीत भट्ट के साथ कलाकार भीम राज वर्धन, तरुण वर्धन, भूपेंद्र अहीर, त्रिलोक सूर्या, सुनील चौहान, अंक भट्ट व रोहित कुमार काफी वर्षों से जुड़े हैं।

एक दौर ऐसा भी आया
प्रेम सिंह ने छह दशक तक कुंजड़ी मल्हार की परंपरा को सहेजे रखा लेकिन उनके निधन के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा कि उनका स्थान सदैव के लिए रिक्त हो जाएगा। 1993 से प्रेम सिंह के भतीजे अजीत भट्ट कुंजड़ी मल्हार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रेम सिंह के साथी तबला वादक करतार सिंह ने अजीत को विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य सौंपा। करीब पांच माह की कड़ी मेहनत के बाद वह कुंजड़ी मल्हार लोक गीतों में पारंगत हो गए। अब अजीत आठ से दस लोगों के साथ कुंजड़ी मल्हार गाते हैं।

युवा पीढ़ी रखती है कम रुचि
अजीत भट्ट ने बताया कि बदले परिवेश में कुंजड़ी मल्हार में युवाओं की रुचि भी कम हुई है, जिसे बढ़ाने के लिए कार्य जारी है। कुंजड़ी मल्हार में वही पारंपरिक गीत गाए जाते हैं, जो पहले गाए जाते थे। इसमें कुछ गीतों के विलुप्त होने की आशंका भी है।
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देस राग में दीपचंदी, दादरा और कहरवा का कमाल
कुंजड़ी मल्हार शब्द का प्रयोग कुंजड़ी यानी कुंज पक्षी और सावन में बरसते मेघ से मल्हार शब्द की उपमा की गई है। कुंजड़ी मल्हार लोक गीतों को प्राय: राग देस में गाया जाता है और इसमें दीपचंदी, दादरा और कहरवा ताल रहता है।
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