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Himachal News: हिमाचल प्रदेश के हजारों कर्मियों को सुप्रीम राहत, अनुबंध सेवाकाल का मिलेगा वरिष्ठता लाभ

Thu, 30 Jul 2026 09:16 AM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी वरिष्ठता और वित्तीय लाभ से जुड़े मामले में हिमाचल प्रदेश सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा। इस निर्णय से संबंधित कर्मचारियों को वरिष्ठता और वित्तीय लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है। अब राज्य सरकार को न्यायालय के आदेश के अनुरूप आगे की कार्रवाई करनी होगी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सरकारी कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम 2024 को रद्द करने के हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर एसएलपी को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वह हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं है।

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हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता के अनुरोध पर हाईकोर्ट के आदेशों की अनुपालना के लिए चार माह का अतिरिक्त समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकार की एसएलपी खारिज होने के बाद अब कर्मचारियों को अनुबंध सेवाकाल का वरिष्ठता एवं वित्तीय लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इसका लाभ प्रदेश के उन हजारों कर्मचारियों को मिलेगा, जिन्होंने नियमित नियुक्ति से पहले वर्षों तक अनुबंध आधार पर सेवाएं दी हैं। 

हिमाचल हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने 25 अप्रैल 2026 को राज्य सरकार के इस अधिनियम को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की थी। हिमाचल हाईकोर्ट में कर्मचारियों से जुड़े हजारों मामले हर रोज सुनवाई के लिए लग रहे हैं। हाईकोर्ट ने इस कानून के आधार पर कर्मचारियों को दिए जाने वाले लाभों को वापस लेने, वरिष्ठता छीनने या रिकवरी (कटौती) करने संबंधी सभी सरकारी फैसले व अस्वीकृति पत्र रद्द किए हैं। कोर्ट ने सक्षम अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे न्यायिक फैसलों व सांविधानिक प्रावधानों के तहत पात्र कर्मचारियों को तीन माह में सेवा लाभ प्रदान करें।
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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि राज्य विधायिका के पास अदालतों की ओर से दिए गए फैसलों को पलटने या निष्प्रभावी बनाने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार ने अदालतों के ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे ताज मोहम्मद मामला) को प्रभावहीन करने के लिए कानून बना न्यायिक शक्तियों में अतिक्रमण किया है। 

संविधान का अनुच्छेद 309 राज्य को लोक सेवाओं के नियम बनाने की शक्ति देता है, लेकिन ऐसा कोई कानून बनाने की अनुमति नहीं देता जो सांविधानिक ढांचे व न्यायिक आदेशों के विपरीत हो। हाईकोर्ट ने नोट किया कि सरकार ने 12 दिसंबर 2003 से पहले नियुक्त अनुबंध कर्मचारियों को अदालती आदेशों के तहत लाभ प्रदान किए, जबकि 12 दिसंबर 2003 के बाद आरएंडपी नियमों के तहत पूरी पारदर्शी प्रक्रिया से चयनित कर्मियों को लाभ से वंचित करने का प्रयास किया गया।

90 के दशक से सेवा लाभ की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारी
अनुबंध अवधि को सेवा लाभों में जोड़ने के लिए कर्मचारी पहली बार कोर्ट नहीं पहुंचे हैं। इससे पहले भी इस मुद्दे पर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी जा चुकी है। 90 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि नियमों के तहत हुई अनुबंध नियुक्ति बाद में नियमित सेवा में परिवर्तित होती है, तो उस अनुबंध अवधि को भी वरिष्ठता और वित्तीय लाभों के लिए गिना जाएगा। कर्मचारी इसी न्यायिक सिद्धांत के आधार पर लगातार अदालतों का रुख कर रहे थे। लेकिन राज्य सरकार की ओर से लाया गया नया कर्मचारी सेवा संबंधी कानून इन लाभों पर रोक लगा रहा था।
 

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जयराम ठाकुर का सुक्खू सरकार पर हमला, भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत
भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून-2024 को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रदेश सरकार पर तीखा हमला बोला है। शिमला से जारी बयान में उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज किया जाना सुक्खू सरकार की "असंवैधानिक नीति" पर करारा जवाब है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट भी इस कानून को निरस्त कर चुका था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। उन्होंने कहा कि सरकार कर्मचारियों के हितैषी होने का दावा करती है, जबकि उसके फैसले कर्मचारियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने भर्ती एवं सेवा शर्तें कानून लाकर कर्मचारियों की वरिष्ठता और वित्तीय लाभ से जुड़े दायित्वों को भविष्य की सरकारों पर डालने का प्रयास किया। भाजपा ने विधानसभा में भी इस विधेयक का विरोध किया था और इसे असंवैधानिक बताया था।

सरकार के अन्य फैसलों पर भी उठाए सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यह पहला अवसर नहीं है जब राज्य सरकार के किसी फैसले पर अदालत ने आपत्ति जताई हो। उन्होंने दावा किया कि इससे पहले बागी विधायकों की पेंशन से जुड़े कानून, वाटर कमीशन, मुख्य संसदीय सचिव (सीपीएस) की नियुक्तियों, बिजली दरों और पंचायत चुनाव से जुड़े मामलों में भी सरकार को न्यायालयों में झटका लगा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन मामलों की कानूनी लड़ाई में सरकारी धन का व्यापक उपयोग हुआ।

'हर बात पर भाजपा को दोष देना मुख्यमंत्री की आदत'
जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार अपनी हर नाकामी के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करती है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की संपत्ति को लेकर सामने आई रिपोर्ट किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा सार्वजनिक आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई थी और उसका भाजपा से कोई संबंध नहीं है।

परीक्षा कानून संशोधन विधेयक का किया स्वागत
लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026 पारित होने का स्वागत करते हुए जयराम ठाकुर ने कहा कि यह कदम परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि इससे पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा में मदद मिलेगी। उन्होंने इस पहल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को बधाई दी।
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