एक टैटू, कुछ यादें और 35 साल का इंतजार
प्रमिला की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि परिवार तक पहुंचने का रास्ता किसी बड़े दस्तावेज या पूरी तरह स्पष्ट जानकारी से नहीं, बल्कि एक छोटे-से टैटू और कुछ बिखरी हुई यादों से खुला। कटक का नाम, ओडिशा से जुड़ी बातें और बांह पर लिखे ओड़िया अक्षर। इन संकेतों को जोड़ते हुए तलाश आगे बढ़ी। कभी-कभी जिंदगी में कोई निशानी कितनी बड़ी बन सकती है, प्रमिला की कहानी इसका उदाहरण है। बांह पर बना वह टैटू शायद वर्षों पहले सिर्फ एक निशान रहा होगा। लेकिन जब परिवार की तलाश शुरू हुई तो वही निशान उन्हें उनके अपनों तक ले जाने वाली कड़ी बन गया।
रिकॉर्ड में दर्ज नाम से आगे भी होती है एक इंसान की पहचान
प्रमिला की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी संस्थागत रिकॉर्ड में दर्ज नाम किसी व्यक्ति की पूरी कहानी नहीं होता। कागज पर वह कहीं रामकली मलिक थीं, कहीं किसी संस्था की निवासी, लेकिन उन सभी पहचान के पीछे एक ऐसी महिला थीं, जिनका भी एक घर था, परिवार था और अपने लोगों से जुड़ी यादें थीं।
35 साल का समय बहुत लंबा होता है। इस दौरान जिंदगी कई मोड़ ले सकती है। लोग बदल सकते हैं, जगहें बदल सकती हैं और यादें भी धुंधली हो सकती हैं। लेकिन रिश्तों की तलाश शायद कभी खत्म नहीं होती। प्रमिला और उनके परिवार की यह मुलाकात उसी उम्मीद की कहानी है। एक टैटू से शुरू हुई तलाश परिवार तक पहुंची और 35 साल से बंद एक रिश्ते का दरवाजा फिर खुल गया और शायद इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यही है कि इतने वर्षों बाद जब प्रमिला ने अपने परिवार की आवाज सुनी, तो उनके बीच की दूरी को न कोई सीमा रोक सकी, न कोई रिकॉर्ड, न बीते हुए साल। बस एक छोटी-सी मोबाइल स्क्रीन थी... और उस स्क्रीन के दूसरी तरफ था अपना परिवार।