मंडी अतंरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में निकली जलेब में भाग लेते राजदेवता माधोराय फाइल फोटो
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मंडी। रियासतशाही खत्म होने के बाद आज भी मंडी जनपद के सभी शुभ कारज राज देवता माधोराय (भगवान कृष्ण) की अगुवाई में ही होते हैं। मंडी के राजा ने माधोराय को ही राजपाठ सौंपा था। इसके चलते इन्हें राजदेवता का दर्जा दिया गया है।
तब से मंडी जनपद के सभी काम इन्हीं की अगुवाई में होते हैं। उपायुक्त कार्यालय के साथ लगते दमदमा महल में माधावराय का मंदिर है। शिवरात्रि मेले के शुरू और समाप्ति पर सभी देवी-देवता और देवलु सबसे पहले राजदेवता के दरबार में हाजिरी भरते हैं। सर्व देवता सेवा समिति के प्रधान शिवपाल शर्मा ने बताया कि शिवरात्रि मेला के दौरान निकलने वाली माधोराय की जलेब लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है। शिवरात्रि के दौरान राजदेवता की तीन मुख्य जलेब निकालने की परंपरा है। इसमें चुनिंदा देवी-देवताओं के रथ, देवलुओं के साथ ढोल-नगाड़ों समेत शिरकत करते हैं। जलेब में पुलिस बैंड, पुलिस और होमगार्ड जवान, घुड़सवार, स्कूल-कॉलेज के एनसीसी कैडेट्स और स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग शामिल होते हैं।
मंडी शिवरात्रि मेला के प्रमुख लोक देवता बड़ादेव कमरूनाग जलेब में शामिल नहीं होते। बड़ादेव मेलों के दौरान टारना स्थित श्यामाकाली मंदिर में ही रहते हैं। अंतिम दिन राजदेवता से मिलन कर विदाई लेते हुए अपने निवासी की ओर प्रस्थान करते हैं। बाकी सभी देवी-देवता चौहट्टा में सजी जातर में भाग लेते हैं। रियासतकाल में हाथी पर सवार होकर राजा देवी-देवताओं के साथ जलेब में शामिल होते थे। उस दौरान शिवरात्रि मेला सेरी चानणी, घंटाघर के आसपास चलता था। इसके कुछ चित्र मंडी की प्राचीन हवेलियों में देखने को मिलते हैं।
माधोराय की जलेब का आज भी वही शाही अंदाज देखने को मिलता है। जलेब में माधोराय की 1705 ई. में बनी चांदी की प्रतिमा को पालकी पर बैठाया जाता है। चांदी की कुर्सी को पड्डल मैदान तक ले जाया जाता है। जलेब में शामिल देवलु ढोल-नगाड़ों की ताल पर नाचते-गाते चलते हैं। हालांकि आज जलेब के स्वरूप में कुछ बदलाव आ गया है। इसमें अब राजाओं की जगह राजनेताओं और जन प्रतिनिधियों ने ले ली है। पहली जलेब में मुख्यमंत्री जन प्रतिनिधियों समेत शामिल होते हैं। दूसरी जलेब में वरिष्ठ मंत्री और अंतिम जलेब में राज्यपाल शामिल होते हैं।
पहले सभी देवी-देवता राज बेहड़े में एक साथ रहते थे। रियासतें खत्म होने पर अब जिला प्रशासन ने अलग-अलग स्थानों पर देवी-देवताओं के ठहरने की व्यवस्था की जाती है। अब कांगणी धार में देव सदन बनने से दोबारा सभी देवी-देवताओं को एक बार फिर एक साथ ठहरने की सुविधा मिलेगी।